भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे अथाहङ्कारस्योत्पत्ति तस्यत्रैविध्यमप्याह- महत्तस्त्रिगुणाज्जातोऽहङ्कारस्त्रिगुणान्वितः । सात्त्विको राजसश्चापि तामसश्चेति स त्रिधा ।। १२ ।। अथाहङ्कारस्योत्पत्ति तस्यत्रैविध्यमप्याह- अहङ्कार की उत्पत्ति और भेद—त्रिगुणात्मक महत्तत्त्व से तीनों गुणों से युक्त अहङ्कारतत्त्व उत्पन्न होता है और वह सात्त्विक, राजस और तामस इन भेदों से तीन प्रकार का है ।। १२ ।। ❖ महतो=बुद्धितत्त्वात्, त्रिगुणात्=त्रयो गुणा यत्र ततः, ननु महत्तत्त्वं त्रिगुणमुक्तमेव, किमर्थ महत्तस्त्रिगुणादिति विशेषणम्, सत्यम्, त्रिगुणादिति पुनर्विशेषणादुक्तं सत्त्वबहुलमिति विशेषणमत्र नानुवर्त्तते, तेनाहङ्कारोत्पादकं महत्तत्त्वं त्रिगुणमपि रजोबहुलंबोद्धव्यम्, अहङ्कारस्य रजोगुणान्वितस्य मनोधर्मत्वाद् । अहङ्कारोऽभिमानव्यापारः । अहङ्कारस्त्रिविधस्तमाह-सात्त्विक इत्यादि ।। १२ ।। महत्तत्त्व से अर्थात् बुद्धितत्त्व से, त्रिगुण से अर्थात् जिसमें तीन गुण विद्यमान हों उससे । यहाँ पर यदि कोई यह शङ्का करे कि 'महत्तत्त्व तो तीन गुणोंवाला है' ऐसा पहले कहा ही गया है पुनः उसका 'त्रिगुण' यह विशेषण यहाँ पर क्यों दिया ? तो इसका उत्तर यह है कि पूर्व में महत्तत्त्व के दो विशेषण कह आये हैं, उनमें से प्रथम 'त्रिगुण' और द्वितीय 'सत्त्वबहुल' है। अब यदि यहाँ पर महत्तत्त्व का विशेषण न होता तो वह त्रिगुण और सत्त्वबहुल इन दो विशेषणों से विशिष्ट लिया जाता, अब उसमें से केवल 'त्रिगुण' विशेषण यहाँ पर देने से 'सत्त्वबहुल' यह दूसरा विशेषण महत्तत्त्व में नहीं लगाया गया। इससे यह सिद्ध हुआ कि अहङ्कार को उत्पन्न करनेवाला महत्तत्त्व यद्यपि त्रिगुण है तथापि उसे पूर्व की भाँति सत्त्वबहुल न समझ कर रजोबहुल (अधिक रजो गुणवाला) ही समझना चाहिये । क्योंकि रजोगुण से युक्त अहङ्कार मनका धर्म है, अभिमानरूपी व्यापार से युक्त जो है, उसे अहङ्कार कहते हैं । वह अहङ्कार तीन प्रकार का है, उसी को सात्त्विक इत्यादि से कहते हैं ।। १२ ।। अथ त्रिविधस्याहङ्कारस्य कार्यमाह- जातानि सात्त्विकात्तस्मादिन्द्रियाणि सराजसात् । तानि श्रोतं त्वचो नेत्रं रसना नासिका तथा ।। १३ ।। वाग्घस्तचरणोपस्थगुदान्येकादशं मनः । पञ्च बुद्धीन्द्रियाण्याहुः प्राक्तनानीतराणि च ।। १४ ।। कर्मेन्द्रियाणि पञ्चैव कथयन्ति विपश्चितः ।। १५ ।। त्रिविध अहङ्कार के कार्य—राजस अहङ्कार से युक्त सात्त्विक अहङ्कार से जो इन्द्रियाँ उत्पन्न हुई हैं, वे कान, त्वचा (चमड़ी), नेत्र, जिह्वा, नाक, वाणी, दोनों हाथ, दोनों पैर, मूत्रेन्द्रिय और गुदा, इस तरह से दश और ग्यारहवाँ मन हैं । इनमें से आरम्भ के पाँच इन्द्रियों को बुद्धीन्द्रिय और बाद की पाँच इन्द्रियों को पण्डित लोग कर्मेन्द्रिय कहते हैं ।। १३- १५ ।। बुद्धीन्द्रियाणि बुद्धेराश्रयत्त्वात्, कर्मेन्द्रियाणि कर्माश्रयत्वात्, सात्त्विकाहङ्काराज्जातत्वादिन्द्रियाणि प्रकाशलक्षणानि, सत्त्वस्य प्रकाशकत्वात् ।। १३-१५ ।। बुद्धि के आश्रित होने से श्रोत्रादि पाँच इन्द्रियों को बुद्धीन्द्रिय और कर्म के आश्रित होने से वाणी आदि पाँच इन्द्रियों को कर्मेन्द्रिय कहते हैं । सात्त्विक अहङ्कार से उत्पन्न होने से इन्द्रियाँ प्रकाशलक्षण वाली हैं, क्योंकि सत्त्वगुण प्रकाशक हैं ।। १३-१५ ।। अथ मनस उभयेन्द्रियत्वमाह- मनो बुद्धीन्द्रियं विज्ञैः कर्मेन्द्रियमपि स्मृतम् । मनोधिष्ठितमेवेदमिन्द्रियं यत्प्रवर्त्तते ।। १६ ।।