भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 68, कुल 1167 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 68

अथ द्वितीयसृष्टिप्रकरणम् १५ मन का बुद्धीन्द्रिय और कर्मेन्द्रिय से अभिन्नता-पण्डित लोगों ने मनको बुद्धीन्द्रिय तथा कर्मेन्द्रिय दोनों ही माना है, क्योंकि बुद्धीन्द्रियाँ या कर्मेन्द्रियाँ जो अपने-अपने विषयों में प्रवृत्त होती हैं, वे केवल मन के अधीन होने से ही, अर्थात् बिना मन के कोई इन्द्रिय अपने विषय को ग्रहण करने में कभी भी समर्थ नहीं हो सकती ॥१६॥ अथेन्द्रियाणां विषयानाह- शब्दः स्पर्शश्च रूपञ्च रसो गन्धो ह्यनुक्रमात् । बुद्धीन्द्रियाणां विषयाः समाख्याता महर्षिभिः ॥१७॥ बुद्धीन्द्रियों के विषय—शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध ये अनुक्रम से बुद्धीन्द्रियों के विषय हैं अर्थात् कानों का विषय शब्द, त्वचा का विषय स्पर्श, नेत्रों का विषय रूप, जिह्वा का विषय रस और नासिका का विषय गन्ध महर्षियों ने कहा है ॥१७॥ वाच्यं ग्राह्यञ्च गन्तव्यमानन्दं त्याज्यमेव च। कर्मेन्द्रियाणां विषयाज्ञानञ्च१ विषयो हृदः ॥१८॥ कर्मेन्द्रिय और मन के विषय—वाच्य, ग्राह्य, गन्तव्य, आनन्द, त्याज्य ये सब यथाक्रम से कर्मेन्द्रियों के विषय हैं अर्थात् वाणी का विषय वाच्य, हाथ का विषय ग्राह्य पाँव का विषय गन्तव्य, लिङ्ग का विषय आनन्द तथा गुदा का विषय ज्याज्य जानना चाहिये और मन का विषय ज्ञान अर्थात् हर एक विषयों की जानकारी रखना है ॥१८॥ ❖ हृदः=मनसः ॥१८॥ यहाँ पर 'हृत्' पद से 'मन' का ग्रहण करना चाहिये ॥१८॥ अथ पञ्चतन्मात्रोत्पत्तिमाह- तामसादप्यहङ्कारातन्मात्राणि सरजसात् । पञ्चाल्पसत्त्वसम्बन्धात्तल्लिङ्गानि भवन्ति हि ॥१९॥ शब्दतन्मात्रकं स्पर्शतन्मात्रं रूपमात्रकम् । रसतन्मात्रकं गन्धतन्मात्रमिति तानि तु ॥२०॥ पंच तन्मात्रों की उत्पत्ति के विषय—राजस अहङ्कार से युक्त तामस अहङ्कार से पाँच प्रकार के तन्मात्र उत्पन्न होते हैं, सत्त्वगुण का थोड़ा सम्बन्ध होने से वे पाँच तन्मात्र तल्लिङ्ग अर्थात् राजस और तामस के जो मोहादिक चिह्न हैं, उनसे युक्त होते हैं। वे सब तन्मात्र शब्दतन्मात्र, स्पर्शतन्मात्र, रूपतन्मात्र, रसतन्मात्र और गन्धतन्मात्र इस प्रकार से पाँच हैं ॥१९-२०॥ ❖ तल्लिङ्गानि=मोहादिलिङ्गानि, तान्यनुद्भूतस्वभावानि२ बाह्येन्द्रियाग्राह्याणि३, शब्दादीन्येव तन्मात्राणि, तानि च योगिभिरेव ग्राह्याणि, सा सा मात्रा यस्मिंस्तत् तन्मात्रम् ।। शब्दतन्मात्र, स्पर्शतन्मात्र, रूपतन्मात्र, रसतन्मात्र और गन्धतन्मात्र ये सब तल्लिङ्ग अर्थात् मोहादि लिङ्ग (चिह्न) वाले हैं। वे सब तन्मात्र अव्यक्त स्वभाव वाले हैं अर्थात् उन सबों का स्वभाव कैसा है यह कुछ नहीं मालूम पड़ता। अत एव वे बाह्येन्द्रिय कर्णादिकों से अग्राह्य हैं अर्थात् उनका ग्रहण इन्द्रियों से नहीं हो सकता। शब्दादि तन्मात्र हैं अर्थात् शब्दतन्मात्र, स्पर्शतन्मात्र इत्यादि क्रम से पाँच तन्मात्र हैं और वे सब योगियों से ही ग्रहण करने योग्य हैं। साधारण लोग उन सबों का ग्रहण नहीं कर सकते, तन्मात्र—वही-वही मात्रा (शब्दादिक) जिसमें हों उसे तन्मात्र कहते हैं अर्थात् शब्दतन्मात्र में शब्द का, स्पर्शतन्मात्र में स्पर्श का, रूपतन्मात्र में रूप का, रसतन्मात्र में रस का और गन्धतन्मात्र में गन्ध की ही केवल सूक्ष्मातिसूक्ष्म मात्रा है। अतः ये सब शब्दादि तन्मात्र कहलाते हैं ॥१९-२०॥ अथ महाभूतोत्पत्तिमाह- तन्मात्रेभ्यो वियद्वायुर्वह्निवारि वसुन्धरा । एतानि पञ्च जायन्ते महाभूतानि तत्क्रमात् ॥२१॥ १. 'ज्ञातव्य' इति पाठान्तरम् २. 'तान्यद्भुतस्वभावानी'ति पाठः सर्वत्रोपलभ्यते, किन्तु तदपेक्षयाऽत्रत्यः पाठः साधीयानिति विभावनीयम्। ३. 'बाह्येन्द्रियग्राह्याणी'ति सर्वत्रोपलब्धः पाठो भ्रान्तिकूलकस्तस्मात्रादरणीयः।