भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे पंचमहाभूतों की उत्पत्ति—शब्दादि पाँच तन्मात्रों से यथाक्रम आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथिवी के पाँच महाभूत उत्पन्न होते हैं ॥२१॥ एकोत्तरपरिवृद्ध्या वियदादयो जायन्त इत्यर्थः । तद्यथा-शब्दतन्मात्राच्छब्दगुणं वियज्जायते, शब्दतन्मात्रसहितात्स्पर्शतन्मात्राच्छब्दस्पर्शगुणो वायुर्जायते, शब्दतन्मात्रस्पर्शतन्मात्रसहिताद्रूपतन्मात्राच्छद- स्पर्शरूपगुणो वह्निर्जायते, शब्दतन्मात्रस्पर्शतन्मात्ररूपतन्मात्रसहिताद्रसतन्मात्राच्छब्दस्पर्शरूपरसगुणं वारि जायते, शब्दतन्मात्रस्पर्शतन्मात्ररूपतन्मात्ररसतन्मात्रसहिताद्गन्धतन्मात्राच्छब्दस्पर्शरूपरसगन्धगुणा वसुन्धरा जायते ॥२१॥ पाँच तन्मात्रों से एक-एक की उत्तरोत्तर वृद्धि द्वारा आकाशादि पाँच महाभूत उत्पन्न होते हैं । जैसे—शब्दतन्मात्र से शब्दगुणवाला आकाश उत्पन्न होता है । शब्दतन्मात्र के सहित स्पर्शतन्मात्र से शब्द और स्पर्शगुणवाला वायु उत्पन्न होता है । शब्दतन्मात्र और स्पर्शतन्मात्र के सहित रूपतन्मात्र से शब्द, स्पर्श और रूप गुणवाला अग्नि उत्पन्न होता है । शब्दतन्मात्र, स्पर्शतन्मात्र और रूपतन्मात्र के सहित रसतन्मात्र से शब्द, स्पर्श, रूप और रस गुणवाला जल उत्पन्न होता है । इसी प्रकार से शब्दतन्मात्र, स्पर्शतन्मात्र, रूपतन्मात्र और रसतन्मात्र के सहित गन्धतन्मात्र से शब्दस्पर्श, रूप, रस और गन्ध गुणवाली पृथ्वी उत्पन्न होती है ॥२१॥ अथ महाभूतानां गुणानाह, तत्रादौ वियद्गुणानाह- शब्दःश्रोत्रेन्द्रियं वाऽपि छिद्राणि च विविक्तता । वियतः कथिता एते गुणागुणविचारिभिः ॥२१॥ आकाश के गुण—गुणों का विचार करनेवाले पण्डितों ने शब्द, कर्णेन्द्रिय, छिद्र और विविक्तता ये सब गुण आकाश के कहे हैं ॥२२॥ ❖ विविक्तता=शारीराणां१ भावानां शिरास्नाव्यस्थिपेशीप्रभृतीनां जातिव्यक्तिभ्यां मिथः पृथक्त्वम् ॥२२॥ विविक्तता=शिरा (कोमल नसें), स्नायु (दृढ़ नसें), हड्डी और मांसपेशी इत्यादि शरीर के अन्दर स्थित जो पदार्थ हैं, उन सबों को जाति और व्यक्ति के द्वारा परस्पर पृथक् करने का नाम विविक्तता है ॥२२॥ अथ वायोर्गुणानाह- स्पर्शस्त्वगिन्द्रियञ्चापि लघुता स्पन्दनं तनोः । चेष्टा सर्वशरीरस्य वायोरेते गुणाः स्मृताः ॥२३॥ वायु के गुण—स्पर्श, त्वगिन्द्रिय, लघुता, शरीर का स्पन्दन (हिलना) और सब शरीर की चेष्टा ये गुण वायु के कहे गये हैं ॥२३॥ अथ वह्नेर्गुणानाह- रूपं नेत्रेन्द्रियं पाकः सन्तापस्तीक्ष्णता तथा । वर्णो भ्राजिष्णुताऽमर्षः शौर्यंवह्नेर्गुणा अमी ॥२४॥ अग्नि के गुण—रूप, नेत्रेन्द्रिय, पाक, सन्ताप, तीक्ष्णता, वर्ण, भ्राजिष्णुता, अमर्ष और शूरता ये सब गुण अग्नि के कहे गये हैं ॥२४॥ ❖ रूपं=लावण्यम् । पाकः=उदराग्निना आहारपाकः । सन्तापः=औष्ण्यम्, तीक्ष्णता=आशुकारिता । वर्णो=गौरादिः । भ्राजिष्णुता=दीप्तिः । अमर्षः=क्रोधः ॥२४॥ रूप=लावण्य (लुनाई), पाक=जठराग्नि के द्वारा उदरगत भोज्य पदार्थों का पचना, सन्ताप=गर्मी, तीक्ष्णता=हर एक कार्यों को शीघ्रता से करना, वर्ण=गोरा काला आदि शरीर का रंग, भ्राजिष्णुता=दीप्ति (कान्ति), अमर्ष=क्रोध ॥२४॥ १. क्वचित् 'शरीराणाम्' इति पाठः । २. 'रसा' इति पाठान्तरम् । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmù. Digitized by S3 Foundation USA