भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ द्वितीयसृष्टिप्रकरणम् ९९ तस्य देहिनः शरीरजीवात्मनोः संयोगकारकेण मनसा संयोगे ये ये गुणा उत्पद्यन्ते तानाह- इच्छाद्वेषसुखासुखानि¹ विषयज्ञानं प्रयत्नो मनः सङ्कल्पश्च विचारणा स्मृतिरथो बुद्धिः कलाविज्ञता । प्राणस्योपरि यापनं गुदवशाद्वायोरधः प्रेरणं नेत्रोन्मेषनिमेषकृत्यकरणोत्साहाश्च जीवे गुणाः ।।३३।। जीव विषयक गुण—इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, विषयों का ज्ञान, प्रयत्न, मनःसङ्कल्प, विचारणा, स्मृति, बुद्धि, कलाओं की अभिज्ञता, प्राण का ऊपर की ओर ले जाना, गुदा के मार्ग से वायु का नीचे की ओर ले जाना, नेत्रों का उन्मेष और निमेष तथा कार्य करने में उत्साह, ये सब जीवविषयक गुण हैं ।।३३।। इच्छा=सुखहेतुरभिलाषः । द्वेषो=दुःखहेतुर्मनोऽप्रवृत्तिः² । सुखं=प्रीतिः³ । असुखम्=अप्रीतिः । विषयज्ञानं= शब्दादिज्ञानम् । प्रयत्नः=कार्ये तात्पर्यम् । मनः=संशयात्मकं, तस्य कर्मसङ्कल्पः । विचारणा=ऊहापोहाभ्यां वस्तुविमर्शः । स्मृतिः=पूर्वानुभूतस्यार्थस्य स्मरणम् । बुद्धिः=निश्चयात्मिका । कलाविज्ञता=शिल्पशास्त्रादिबोधः । प्राणस्य=हृदयस्थितस्य वायोरुपरि यापनम्=मुखादिप्रतिनयनम् । गुदवशाद्वायोरधःप्रेरणम्=अपानस्याधःप्रेरणम् । नेत्रोन्मेषनिमेषौ=नेत्रयोरुन्मीलननिमीलने । कृत्य-करणोत्साहः=कार्यारम्भे सामर्थ्येनोत्साहः । जीवे=मनोयुक्तस्य जीवात्मनः । अमी=इच्छादयो गुणाः ।।३३।। इति श्रीमिश्रलटकनतनय श्रीमन्मिश्र भावविरचिते भावप्रकाशे सृष्टिप्रकरणं समाप्तम् ।। ❖❖❖ इच्छा=सुखमूलक अभिलाष, द्वेष=दुःखमूलक मन की अप्रवृत्ति, सुख=प्रीति, असुख=अप्रीति, विषयज्ञान=शब्द, स्पर्श, रूप, रस तथा गन्ध विषयक ज्ञान, प्रयत्न=कार्यविषयक तत्परता, मन=यह वस्तु है या नहीं इस प्रकार का संशय (सन्देह) करनेवाला, उसका सङ्कल्प=संशयात्मक मन का कर्म अर्थात् मन के द्वारा सङ्कल्प करना, विचारणा=ऊहापोह (तर्क-वितर्क के द्वारा वस्तुविषयक विचार), स्मृति=पूर्व में अनुभूत अर्थ का स्मरण, बुद्धि=निश्चयात्मिका (यह वही वस्तु है दूसरा नहीं), कलाविज्ञता=शिल्प-शास्त्रादि का बोध, प्राणका अर्थात् हृदयस्थित वायु का ऊपर (मुखादि की) ओर ले जाना, गुदा के मार्ग से वायु का नीचे की ओर ले जाना अर्थात् अपान वायु का नीचे की ओर लेजाना, नेत्रों का उन्मेष और निमेष अर्थात् नेत्रों का खोलना और मूँदना, कार्य करने में उत्साह अर्थात् कार्य के आरम्भ करने में सामर्थ्य के अनुरूप उत्साह, जीव विषयक अर्थात् मन से युक्त जीवात्मा के ये इच्छा आदि गुण हैं ।।३३।। इति श्रीभिषग्रत्नब्रह्मशङ्करशर्मसाहित्यशास्त्रिणा विरचितायां 'विद्योतिनी' भाषाटीकायां द्वितीयसृष्टिप्रकरणम् समाप्तम् ।।२।। ❖❖❖ १. 'दुःखसुखानि'ति पाठान्तरम् । २. 'मनःप्रवृत्ति'रिति. पाठान्तरम् । ३. 'अदुःखमि'ति पाठान्तरम् ।