भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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अथ तृतीयगर्भप्रकरणम् चिकित्सायां शरीरी ह्याधिकृतः स शरीरी यथोत्पद्यते तद्बोधयितुं गर्भोत्पत्तिक्रममाह । गर्भोत्पत्तिभूमिस्तु रजस्वला स्त्री, ततो रजस्वलास्वरूपमाह- द्वादशाद्वत्सरादूर्ध्वमापञ्चाशत्समाः स्त्रियः। मासि मासि भगद्वारा प्रकृत्यैवार्त्तवं स्रवेत् ।। १ ।। रजस्वला स्त्री के स्वरूप—बारह वर्ष की अवस्था से लेकर पचास वर्ष की अवस्था तक की स्त्रियों के भग (योनि) के मार्ग से प्रत्येक महीने में स्वभावतः आर्त्तव (रज) निकलता रहता है ।। १ ।। अथ गर्भग्रहणयोग्यं समयमाह- आर्त्तवस्रावदिवसाद्दूतुः षोडश रात्रयः। गर्भग्रहणयोग्यस्तु स एव समयः स्मृतः ।।२।। गर्भ ग्रहण के योग्य समय—जिस दिन से रज निकलने लगता है, उस दिन से लेकर सोलहवीं रात्रि पर्यन्त समय को ऋतुकाल कहते हैं। यही सोलह रात्रि व्यापी ऋतुकाल गर्भ धारण करने के योग्य समय है ।।२।। ❖ सर्वासामेव चतुर्वर्णस्त्रीणां सर्ववादिसम्मतः पूर्वोक्तः समयः । ग्रन्थान्तरे तु विशेषः । तद्यथा- स्नानदिवसाद्दूर्ध्वं द्वादशरात्रावधि ब्राह्मण्याः, दशरात्रावधि क्षत्रियायाः, अष्टरात्रावधि वैश्यायाः, षड्रात्रावधि शूद्राया गर्भधारणे शक्तिः ।। २ ।। चारो वर्णों की सभी स्त्रियों के गर्भधारण करने के सम्बन्ध में पूर्वोक्त समय सभी विद्वानों के सम्मत है किन्तु दूसरे ग्रन्थों में इससे कुछ विशेष लिखा है, कि—जिस दिन रजस्वला स्त्री स्नान करके शुद्ध होती है, उस दिन से लेकर बारह रात्रि तक ब्राह्मणी, दस रात्रि तक क्षत्रिया, आठ रात्रि तक वैश्य और छः रात्रि तक शूद्रा स्त्री की गर्भधारण करने में शक्ति (सामर्थ्य) रहती है ।।२।। अथ रजस्वलाया नियमानाह- आर्त्तवस्रवदिवसादहिंसा ब्रह्मचारिणी । शयीत दर्भशय्यायां पश्येदपि पतिं न च ।।३।। करे शरावे पर्णे वा हविष्यं त्र्यहमाहरेत् । अश्रुपातं नखच्छेदमभ्यङ्गमनुलेपनम् ।।४।। नेत्रयोरञ्जनं स्नानं दिवास्वापं प्रधावनम् । अत्युच्चशब्दश्रवणं हसनं बहुभाषणम् ।। आयासं भूमिखननं प्रवातःञ्च विवर्जयेत् ।। ५ ।। रजस्वला स्त्रियों के नियम—रजस्वला स्त्री जिस दिन रजोधर्म हो जाय उस दिन से तीन दिन तक किसी जीव की हिंसा न करे, ब्रह्मचर्य से रहे, कुश की बनी हुई चटाई पर सोवे और पति का दर्शन न करे तथा आँसू का गिराना (रोना), नखों का काटना या कटाना, तेल लगाना, चन्दनादिका लेप करना, आँखों में अंजन लगाना, स्नान करना, दिन में सोना, दौड़ना, अत्यन्त ऊँचे शब्दों का सुनना, हँसना, बहुत बोलना, परिश्रम करना, जमीन का खोदना, जहाँ पर अधिक वायु हो वहाँ पर बैठना, ये सब छोड़ देवे ।। ३-५ ।। एतस्या नियमाकरणे दोषानाह- अज्ञानाद्वा प्रमादाद्वा लोभाद्वा दैवतश्च वा ।। ६ ।। सा चेत् कुर्यान्निषिद्धानि गर्भो दोषांस्तदाऽऽप्नुयात् । एतस्या रोदनाद्गर्भो भवेद्विकृतलोचनः ।।७।। नखच्छेदेन कुनखी कुष्ठी त्वभ्यङ्गता भवेत् । अनुलेपात्तथा स्नानाद् दुःख्शीलोऽञ्जनाद्दृक् ।।८।। स्वापशीलो दिवास्वापाच्चञ्चलः स्यात् प्रधावनात् । अत्युच्चशब्दश्रवणाद्वधिरःखलु जायते ।।९।। तालुदन्तौष्ठजिह्वासु श्यावो हसनतो भवेत् । प्रलापी भूरिकथनादुन्मत्तस्तु परिश्रमात् ।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA