भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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अथ तृतीयगर्भप्रकरणम् २१ स्खलते भूमिखननादुन्मत्तो बातसेवनात् ।।१०।। रजस्वला स्त्री के नियम नहीं पालन करने पर दोष—यदि रजस्वला स्त्री अज्ञान के वश या असावधानता के वश या लोभ के वश अथवा दैव के वश होकर पूर्वोक्त अश्रुपातादि निषिद्ध कार्यों को करे तो उसका गर्भ दोषों को प्राप्त करता है, जैसे—रोने से विकृति नेत्रवाला, नखों के काटने से खराब नखोंवाला, तेल लगाने से कोढ़ी शरीर वाला, चन्दनादि का लेप तथा स्नान करने से सदा दुःखित रहनेवाला, अञ्जन लगाने से अन्धा, दिन में सोने से अधिक सोनेवाला, दौड़ने से चञ्चल स्वभाव वाला, अत्यन्त ऊँचे शब्द के सुनने से बहिरा, हँसने से तालु, दाँत, ओष्ठ और जिह्वा श्याव (कृष्णमिश्रित पीत वर्ण) वाला, अधिक बोलने से बकवाद करनेवाला, परिश्रम करने से पगला, भूमि खोदने से चलते- चलते लड़खड़ा कर गिर पड़नेवाला और जहाँ पर अधिक वायु हो वहाँ पर बैठने से गर्भस्थ शिशु पागल होता है ।।६- १०।। अथ रजस्वलाकृत्यम्- पूर्व पश्येदृतुस्नाता यादृशं नरमङ्गना । तादृशं जनयेत् पुत्रं ततः पश्येत्पतिं पश्येत्पतिं प्रियम् ।।११।। स्नानोत्तर रजस्वला स्त्री का कर्त्तव्य—रजस्वला स्त्री ऋतुस्नान करके प्रथम जिस तरह के पुरुष को देखती है, उसी तरह के पुत्र को उत्पन्न करती है। अतः ऋतुस्नान करने के बाद सर्वप्रथम पति का अथवा जो अपना प्रिय हो उसका दर्शन करें ।।११।। ❖ प्रियमिति । भर्त्तर्यनासन्ने पुत्रादिकमपि पश्येत् ।।११।। ‘प्रिय’ शब्द का तात्पर्य यह है कि यदि पति पास में न हो तो अपने प्रिय पुत्रादि का ही दर्शन करे ।।११।। चतुर्थादिदिवसेऽपि रजोनिवृत्तौ स्त्री पत्या सङ्गच्छेन्न तु रजेऽनुवृत्तौ । यत आह प्रवहत्सलिले क्षिप्तं द्रव्यं गच्छत्यधो यथा । तथा वहति रक्ते तु क्षिप्तं वीर्यमधो व्रजेत् ।।१२।। चौथा पाँचवाँ आदि दिन होने पर यदि रजःस्राव बन्द हो गया हो तभी स्त्री पति के साथ सङ्ग करे, रजःस्राव हो रहा हो तो सङ्ग न करे। क्योंकि 'बहते हुये जल में फेंका हुआ द्रव्य जिस भाँति नीचे की तरफ बह कर चला जाता है, उसी भाँति रजःस्राव होते हुये में गिराया हुआ पुरुष का वीर्य बह कर नीचे की ओर चला जाता है अर्थात् गर्भाशय में नहीं ठहरने पाता, किन्तु रजःस्राव के साथ बाहर निकल जाता है ।।१२।। अथ भर्तृकृत्यम् । तत्र गर्भाधाने निषिद्धं विहितं च कालं तयोः फलञ्चाह- आयुः क्षयभयाद्भर्त्ता प्रथमे दिवसे स्त्रियम् ।।१३।। द्वितीयेऽपि दिने रत्यै त्यजेदृतुमतीं तथा । तत्र यश्चाहितो गर्भो जायमानो न जीवति ।। आहितो यस्तृतीयेऽह्नि स्वल्पायुर्विकलाङ्गकः ।।१४।। रजस्वला स्त्री के साथ सम्भोग करने का निषेध—पति 'आयु का नाश होगा' इस भय से रजोधर्म का प्रथम, द्वितीय तथा तृतीय दिन भी ऋतुमती स्त्री के साथ सङ्ग करना छोड़ देवे क्योंकि प्रथम और द्वितीय दिन में ऋतुमती स्त्री के साथ सङ्ग करने से आयु का क्षय होता है तथा जो गर्भ स्थित होता है, वह उत्पन्न होने पर जीता नहीं है और तीसरे दिन में जो गर्भ स्थित होता है, वह थोड़ी आयुवाला और विकलाङ्ग (न्यूनाधिक अङ्गोंवाला) होता है ।।१३-१४।। अतश्चतुर्थी षष्ठी स्यादष्टमी दशमी तथा । द्वादशी वाऽपि या रात्रिस्तस्यान्तां विधिना भजेत् ।। ऋतुमती के साथ सम्भोग करने का प्रशस्त दिन—चौथी, छठीं, आठवीं, दशवीं या बारहवीं जो रात्रि हो, उसमें विधि से ऋतुमती स्त्री के साथ सङ्ग करे ।।१५।।