भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

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२२ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे विधिना=गर्भाधानोक्तविधिना ।।१५।। 'विधिना' पदसे 'गर्भाधान के विषय में कही हुई विधि से' यह अर्थ समझना चाहिये ॥१५॥ तन्त्रान्तरे- अत्रोत्तरोत्तरं विद्यादायुरारोग्यमेव च। प्रजासौभाग्यमैश्वर्यं बलञ्चाभिगमात् फलम् ।।१६।। उपर्युक्त रात्रियों में स्त्रीगमन करने से उत्तरोत्तर आयु, आरोग्य, प्रजा (सन्तान) का सौभाग्य, ऐश्वर्य और बल की प्राप्ति होती है। अर्थात्-चौथी रात्रि में स्त्रीगमन करने से आयु, छवीं रात्रि में आरोग्य, आठवीं रात्रि में प्रजा का सौभाग्य, दसवीं रात्रि में ऐश्वर्य और बारहवीं रात्रि में बल का लाभ होता है ॥१६॥ अथ सर्वासां स्त्रीणां योनिमध्ये नाडीत्रयमस्तीत्याह- मनोभवागारमुखेऽबलानां तिस्रो भवन्ति प्रमदाजनानाम् । समीरणा चन्द्रमुखी च गौरी विशेषमासामुपवर्णयामि ।।१७।। स्त्रियों की योनि की नाड़ियाँ—अबला जो स्त्रियाँ है उनके भगद्वार में समीरणा, चान्दमसी और गौरी नाम की तीन नाड़ियाँ होती हैं। उन सबों की जो विशेषता है उसका वर्णन निम्नलिखित है ॥ अथ तासां विशेषमाह- प्रधानभूता मदनातपत्रे समीरणा नाम विशेषनाडी । तस्या मुखे यत् पतितं तु वीर्यं तन्निष्फलं स्यादिति चन्द्रमौलिः ।।१८।। या चापरा चान्द्रमसी च नाडी कन्दर्पगेहे भवति प्रधाना। सा सुन्दरी योषितमेव सूते साध्या भवेदल्परतोत्सवेषु ।।१९।। गौरीति नाडी यदुपस्थगर्भे प्रधानभूता भवति स्वभावात् । पुत्रं प्रसूते बहुधाऽङ्गना सा कष्टोपभोग्या सुरतोपविष्टा ।।२०।। स्त्रीयोनि के नाड़ियों की विशेषता—मदनातपत्र (योनिद्वार) में प्रधानरूप से समीरणा नाम की जो एक विशेष प्रकार की नाड़ी है, उसके मुख में जो वीर्य पड़ जाता है, उससे गर्भ स्थित नहीं होता और कन्दर्पगृह (भग) के मध्य में जो प्रधानरूप से चान्द्रमसी नाम की दूसरी नाड़ी होती है, उस नाड़ी के मुख में वीर्य गिरने पर वह सुन्दरी कन्या ही उत्पन्न करती है तथा वह स्त्री थोड़ी ही रतिक्रिया करने से साध्य हो जाती है और जिस स्त्री के भग के मध्य में गौरी नाम की प्रधानरूप से जो नाड़ी रहती है उसके मुख में यदि वीर्य गिरे तो स्वभावतः वह स्त्री पुत्र ही उत्पन्न करती है तथा रतिक्रिया में प्रायः करके कष्ट से साध्य होती है (जल्दी उसका स्खलन नहीं होता ऐसा चन्द्रमौलि आचार्य का मत है) ॥१८-२०॥ अथ युग्मायुग्मरात्रीणां फलमाह- युग्मासु पुत्रा जायन्ते स्त्रियोऽयुग्मासु रात्रिषु ।।२१।। सम तथा विषम रात्रियों में स्त्रीगमन करने का फल—युग्म अर्थात् चौथी, छठीं, आठवीं, दसवीं, बारहवीं और सोलहवीं रात्रियों में ऋतुमती स्त्रियों के साथ सङ्ग करने से पुत्र उत्पन्न होते हैं और अयुग्म अर्थात् पाँचवीं, सातवीं, नौवीं, इ्यारहवीं, तेरहवीं, पन्द्रहवीं, रात्रियों में स्त्रीगमन करने से पुत्रियाँ उत्पन्न होती हैं ॥२१॥ तत्र दम्पत्योः सम्भोगे यादृक्पुमान्युक्तस्तादृगुच्यते- स्नातश्चन्दनलिप्ताङ्गः सुगन्धिसुमनोऽञ्चितः । भुक्तवृष्यः सुवसनः सुवेशः समलङ्कृतः ।।२२।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA