भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६७८ भावप्रकाशनिघण्टुः इसका एक अन्यभेद श्वेत शिरीष पाया जाता है। यह आ० प्रोसेरा (A. procera) है। इसकी छाल श्वेत या हरित श्वेत, उपपक्ष ३-६ जोड़े एवं पत्रक ५-११ जोड़े, १ से २ १/४ इञ्च लम्बे होते हैं। पुष्प-मुण्डक काले शिरीष की तरह होते हैं। फली-४-८ इञ्च × १/२ - १ इञ्च, भूरी एवं ८-१२ बीज युक्त होती है। इसे मराठी में किन्हइ कहते हैं तथा इसे प्राचीनों का कटभी या किणिही मानना उचित है ऐसा श्री ठा० बलवन्तसिंह जी का मत है। शिरीष की छाल एवं बीज का उपयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन—इसमें गोंद, सेफोनिन एवं टैनिन ७-११% होता है। गुण और प्रयोग—यह उष्ण, तिक्त, कषाय, त्रिदोषघ्न, विषघ्न, त्वक् दोषहर, कासहर, पौष्टिक, बाजीकर एवं ग्राही है। (१) शुक्रस्तंभन के लिये पुष्पों का प्रयोग करते हैं। वीर्य गाढ़ा करने के लिये इसके बीजों को दूध एवं शर्करा के साथ देते हैं। छाल का चूर्ण घृत के साथ शरीर को पुष्ट बनाने के लिये उपयोगी है। (२) छाल के क्वाथ में कुल्ला करने से दाँत मजबूत होते हैं। (३) गंडमाला में बीजों का लेप किया जाता है तथा खिलाते भी हैं। (४) रतौंधी में पत्तों का क्वाथ पिलाते हैं तथा स्वरस आँख में लगाते हैं। मात्रा—छाल का चूर्ण ३ से ६ माशा; बीजचूर्ण १ से २ माशा; पुष्प या पत्रस्वरस १ से २ तोला। अथ क्षीरिवृक्षपञ्चकं त्वक्पञ्चकञ्च । तयोर्लक्षणं तत्पत्रस्य च गुणाँश्चाह न्यग्रोधोदुम्बराश्वत्थपारीषप्लक्षपादपाः । पञ्चैते क्षीरिणो वृक्षास्तेषां त्वक्पञ्चवल्कलम् ।।१५।। “क्षीरिवृक्ष-पञ्चक" से प्रसिद्ध वृक्षों के हिन्दी नाम—बरगद, गूलर, पीपल, पारीष और पाकर इन्हीं पाचों क्षीरिवृक्षों के समुदाय को क्षीरिवृक्ष-पञ्चक समझना चाहिये। एवम् इन्हीं पाँचों के वल्कल को “पञ्चवल्कल" समझना चाहिये। [१५] ❖ केचित्तु पारीषस्थाने शिरीषं, वेतसं परे, वा वदन्तीति विशेषः ।।१५।। यहाँ पर मूल में कोई विद्वान् पारीष के स्थान में शिरीष तथा और दूसरे विद्वान् वेतस का पाठ मानते हैं। यह विशेष समझना चाहिये। [१५] क्षीरिवृक्षा हिमा वर्ण्या योनिरोगव्रणापहाः । रूक्षाः कषाया मेदोघ्ना विसर्पामयनाशनाः ।।१६।। शोथपित्तकफास्रघ्नाः स्तन्या भग्नास्थियोजकः । त्वक्पञ्चकं हिमं ग्राहि व्रणशोथविसर्पजित् ।।१७।। तेषां पत्रं हिमं ग्राहि कफवातास्रनुल्लघु । विष्टम्भाध्मानजित्तिक्तं कषायं लघु लेखनम् ।।१८।। क्षीरिवृक्ष पञ्चक—कषाय रसयुक्त, शीतल, वर्ण को उत्तम करने वाले, रूक्ष, दुग्धवर्धक, टूटी हुई हड्डियों को जोड़ने वाले एवम् योनिरोग, व्रण, मेद, विसर्प, शोथ, पित्त, कफ तथा रक्तविकार के नाशक हैं। पञ्चवल्कल (उक्त क्षीरिवृक्षों की छाल)—शीतल, ग्राही एवम् व्रण, शोथ तथा विसर्पनाशक है। क्षीरिवृक्षपत्र—तिक्त तथा कषाय रसयुक्त, शीतल, ग्राही, लघु, किंचित् लेखन एवम् कफ, वात, रक्तविकार, विष्टम्भ और आध्मान को दूर करने वाले होते हैं। [१६-१८] अथ शालः (साखू) । तस्य नामानि गुणाँश्चाह शालस्तु सर्जकाश्यर्याश्वकर्णकाः शस्यशम्बरः । अश्वकर्णः कषायः स्याद् व्रणस्वेदकफक्रिमीन् ।। ब्रध्नविद्रधिबाधिर्ययोनिकर्णगदान् हरेत् ।।१९।।