भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

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वटादिवर्गः ६७९ साखू के संस्कृत नाम-शाल, सर्ज, कार्श्य, अश्वकर्णक और शात्यशम्बर ये सब हैं। साखू-कषायरसयुक्त एवम्-व्रण, स्वेद, कफ, क्रिमि, ब्रध्न, विद्रधि, बहरापन एवं योनि तथा कर्णसम्बन्धी रोग को दूर करने वाला है। [१९] ९. शाल हिं०-शाल, साल, साखु, सखुआ। बं०-शालगाछ, तलूरा। म०-रालचा वृक्ष। गु०-शलवृक्ष, रालनुं झाड़। ते०-जलरि चेट्टु, इनुमद्धि। ता०-कुंगिलियम्। उरिया-सल्व। नेपा०-सकब। अं०-The Sal Tree (दि साल ट्री)। ले०-Shorea robusta Gaertn. f. (शोरिया रोबेस्टा)। Fam. Dipterocarpaceae (डिप्टेरोकार्पेसी)। शाल के वृक्ष बहुत बड़े विशाल होते हैं। ये हिमालय पहाड़, सतलज नदी से आसाम तक, मध्य हिन्दुस्तान के पूर्वीभाग, बंगाल के पश्चिमी भाग और छोटा नागपुर के जंगलों में होते हैं। इसके पत्ते-६-१० × ४-६ इञ्च एवं बड़े अंडाकार-आयताकार होते हैं। फूल-पीले रंग के झुमकों में वसन्त ऋतु में लगते हैं और फल-छोटे होते हैं। इसकी लकड़ी बहुत मजबूत और बड़े काम की होती है। इसके गोंद को राल कहते हैं। फल वर्षा ऋतु के प्रारम्भ में पक जाते हैं। शालसार ताजा काट कर निकालने पर लाल या सफेद दोनों तरह का होता है जिनमें से श्वेत शाल अच्छा माना जाता है। शाल के निर्यास को राल कहते हैं जिसका कर्पूरादि वर्ग में वर्णन किया जा चुका है। नोट-यद्यपि भा० प्र० में अश्वकर्ण, शाल का पर्याय एवं अजकर्ण, सर्जक का पर्याय दिया है तथापि ये चार भिन्न वृक्ष हो सकते हैं क्योंकि सुश्रुत सालसारादिगण में साल, अजकर्ण एवं अश्वकर्ण नामक ३ वृक्ष तथा चरक में कषाय स्कन्ध में साल, सर्ज, अश्वकर्ण एवं अजकर्ण नामक ४ वृक्षों का वर्णन मिलता है। इस दृष्टि से अश्वकर्ण यह डिप्टेरोकार्पस ऑलेटस् (Dipterocarpus alatus), हिं०-गर्जन एवं अजकर्ण यह टर्मिनेलिया टोमेण्टोसा (Terminalia tomentosa), हिं०-असन हो सकता है। अथ शालभेदः (सर्जकः) । तस्य नामानि गुणाँश्चाह सर्जकोऽन्योऽजकर्णः स्याच्छालो मरिचपत्रकः ॥२०॥ अजकर्णः कटुस्तिक्तः कषायोष्णो व्यपोहति। कफपाण्डुश्रुतिगदान् मेहकुष्ठविषव्रणान् ॥२१॥ सर्ज (यह साखू का भेद है) के संस्कृत नाम-सर्जक, अजकर्ण, शाल और मरिचपत्रक ये सब हैं। सर्ज-कटु तिक्त तथा कषायरसयुक्त, उष्ण एवम् कफ, पाण्डु, कर्णसम्बन्धी रोग, प्रमेह, कुष्ठ, विष तथा व्रण को दूर करने वाला होता है। [२०-२१] १०. सर्जक हिं०-बड़ा साल। बं०-कुन्द्रो। म०-सफेद डामर, चन्ड्रस। गु०-धूप। क०-दमर। ते०-तेल्लदामरमु। ता०-बेल्ल कुनुरिकम्। यूना०-संद्रस, सुंदरस। ले०-Vateria-indica Linn. (वेटेरिया इण्डिका)। Fam. Dipterocarpaceae (डिप्टेरोकार्पेसी)। यह पश्चिम भारत और दक्षिण हिन्दुस्तान के जंगलों में बहुत होता है। इसका वृक्ष- बहुत हरा-भरा और सुहावना दिखाई पड़ता है। पत्ते-४ से १० इञ्च तक लम्बे तथा ३॥ इञ्च तक चौड़े, जड़ की ओर गोलाकार और अंडाकार होते हैं। फूल-आध से पौन इञ्च के घेरे में गोलाकार होते हैं। फल-२-२॥ इञ्च लम्बे गोल होते हैं। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA