भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६८० भावप्रकाशनिघण्टुः अथ शल्लकी (सलई) । तस्या नामानि गुणांश्चाह शल्लकी गजभक्ष्या च सुवहा सुरभी रसा । महेरुणा कुन्दुरुकी वल्लकी च बहुस्रवा ।।२२।। शल्लकी तुवरा शीता पित्तश्लेष्मातिसारजित् । रक्तपित्तव्रणहरी पुष्टिकृत्समुदीरिता ।।२३।। सलई के संस्कृत नाम- शल्लकी, गजभक्ष्या, सुवहा, सुरभि, रसा, महेरुणा, कुन्दुरुकी, वल्लकी और बहुस्रवा ये सब हैं । सलई- कषाय रसयुक्त, शीतल, पुष्टिकारक, एवम्-पित्त, कफ, अतिसार, रक्तपित्त तथा व्रण को दूर करने वाली कही हुई है । [२२-२३] ११. सालई हिं०- सालई, सलई । बं०- सलै । म०- सालई वृक्ष । गु०- शालेडुं, धूपडो, सालेडा । कुमाऊँ- अदुंकु । गोंड- सल्ल । संताल- साल्गा । क०- मादिमर । ता०- कुंदुरुकम् । मा०- सेलो । ते०- परंगिसाम्राणि । ले०- Boswellia serrata Roxb. (बॉस्वे़लिया सेरेटा) । Fam. Burseraceae (बर्सेर्रेसी) । यह पश्चिम हिमालय के नीचे के जंगलों में, मध्य भारत, बिहार से राजपूताना तक, दक्षिण और कोंकण आदि प्रान्तों में होता है । आसाम तथा बंगाल में नहीं होता । सालई का वृक्ष- ३० फीट तक ऊँचा होता है । शाखाएँ- नीचे की ओर झुकी हुई होती हैं । छाल- रक्ताभपीत या हरित श्वेत, चिकनी और कागज के समान छूटने वाली होती है । संयुक्त पत्तियाँ शाखाओं के अग्र पर दलबद्ध रहती हैं। पत्रक- आमने-सामने वा कुछ अन्तर देकर, ८ से १५ जोड़े होते हैं जो लम्बे, नीम के पत्तों के समान भालाकार या रेखाकार तथा दन्तमय धारवाले होते हैं । पुष्प- छोटे एवं श्वेत रंग के होते हैं । पुष्प के बाह्य कोश एवं आभ्यंतरकोश के दल ५-५; पुंकेशर ५ बड़े और ५ छोटे होते हैं । फल- मांसल और तीन धार वाला होता है जो पकने पर तीन भागों में फटता है । रासायनिक संगठन- इसकी छाल में चीरा लगाने से एक तरह का गोंद निकलता है जिसे 'सलईगूगल' कहते हैं । प्राचीनों ने इसी को कुन्दुरु लिखा है लेकिन आजकल बाजार में बिकने वाला कुन्दुरु इसी जाति के विदेशी वृक्ष, बॉ० फ्लोरिबंडा का गोंद है जो अरब एवं अफ्रीका से आता है । 'कुन्दुरु एवं सलई गूगल' का वर्णन पहले कर्पूरादि वर्ग में (पृष्ठ २१२) किया जा चुका है । गुण और प्रयोग- सलई की छाल शीतल, पुष्टिकर, ग्राही तथा त्वच्य होती है । इसका प्रयोग अतिसार, रक्तातिसार, रक्तपित्त, अर्श, कुष्ठ एवं व्रण में किया जाता है । (१) अतिसार में इसकी छाल, शर्करा तथा मधु का उपयोग किया जाता है । रक्तातिसार में इसे दूध में घिसकर शहद मिलाकर पिलाते हैं । (२) श्वास में इसके चूर्ण को घृत एवं मधु के साथ चटाया जाता है । (३) अन्य द्रव्यों के साथ इसके क्वाथ से व्रण-प्रक्षालन किया जाता है । (४) सलई के फल तथा फूल का उपयोग कफविकार, वातविकार, अर्श, कुष्ठ तथा अरुचि में किया जाता है । मात्रा- त्वक्चूर्ण ३-६ माशा । अथ शिंशपा (शीसम) । तस्या नामानि गुणांश्चाह शिंशपा पिच्छिला श्यामा कृष्णसारा च सा गुरु । कपिला सैव मुनिभिर्भस्मगर्भैतिकीर्तिता ।।२४।।