भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

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वटादिवर्गः ६८१ शिंशपा कटुका तिक्ता कषाया शोषहारिणी । उष्णवीर्या हरेन्मेदःकुष्ठश्वित्रवमिक्रिमीन् ।। वस्तिरुक्प्रणदाहास्त्रबलासान् गर्भपातिनी ।।२५।। शीसम के संस्कृत नाम—शिंशपा, पिच्छिला, श्यामा और कृष्णसारा ये सब हैं। यदि वही शीसम भारी एवं कपिल (भूरा) रंग का हो तो उसका संस्कृत नाम— 'भस्मगर्भा' है। शीसम—कटु, तिक्त तथा कषायरसयुक्त, उष्णवीर्य, गर्भ गिराने वाला एवम्-शोष, मेद, कुष्ठ, श्वेतकुष्ठ, वमन, क्रिमि, वस्तिसम्बन्धी रोग, व्रण, दाह, रक्तविकार और कफ का नाशक है। [२४-२५] १२. शीसम हिं०—सीसम; कपिलवर्ण—शीसम, शीशो, शीसव। बं०—शिसु। म०—शिसव। गु०—सीस। क०—अगरू गिड़। ते०—सिंसुप। ता०—गेट्टे। ले०—Dalbergia sissoo Roxb. (डालबर्जिया सिस्सू)। Fam. Leguminosae (लेग्युमिनोसी)। सीसो के वृक्ष—प्रायः सब प्रान्तों में लगाये जाते हैं तथा पश्चिम हिमालय में ४००० फीट तक, नेपाल की तराई, सिक्किम तथा ऊपरी आसाम के जंगलों में पाये जाते हैं। इसका वृक्ष बड़ा और विशाल हुआ करता है। इसकी लकड़ी मजबूत होती है। इसके लकड़ी से बहुत सुन्दर सन्दूक, पलङ्ग, प्रभृति अनेक वस्तुएँ तैयार होती हैं। इसके पत्ते—गोल, नोकदार, बेर के पत्तों के समान पर इनसे कुछ बड़े तथा पाढ़ी के पत्तों के समान होते हैं। ये चिकने और ऊपर से चमकीले होते हैं। फूल—बहुत छोटे-छोटे गुच्छों में और फली—लम्बी, पतली और चिपटी होती है। बीज—छोटे-छोटे और चिपटे होते हैं। इसकी लकड़ी श्यामता और ललाई लिये भूरे रंग की दृढ़ होती है। इसकी एक अन्य जाति डा० लेटिफोलिया (D. latifolia Roxb.) होती है जिसकी लकड़ी भी फर्नीचर बनाने के काम में आती है जिसे अंग्रेजी में इंडियन रोजवुड (Indian Rosewood) कहते हैं। रासायनिक संगठन—लकड़ी के सार में ५.३५% गाढ़ा तेल होता है। फली में टैनिन २% होता है। गुण और प्रयोग—इसकी लकड़ी चर्मरोग एवं वमन में लाभदायक है। इसके पत्तों का क्वाथ सोजाक में देते हैं। इसका तेल व्रणशोधन है एवं कुष्ठ, कृमि, वातविकार एवं कफनाशक है। मात्रा—सार-लकड़ी ५ से ७ माशा। अथ ककुभः (अर्जुन)। तस्य नामानि गुणाँश्चाह ककुभोऽर्जुननामाख्यो नदीसर्जश्च कीर्त्तितः । इन्द्रद्रुर्वीरवृक्षश्च वीरश्च धवलः स्मृतः ।।२६।। ककुभः शीतलो हृद्यः क्षतक्षयविषास्त्रजित् । मेदोमेहव्रणान् हन्ति तुवरः कफपित्तहृत् ।।२७।। अर्जुन के संस्कृत नाम—ककुभ, अर्जुन के संज्ञावाचक सभी शब्द (जैसे अर्जुन, गाण्डीवी, पार्थ, धनञ्जय, कर्णारि आदि), नदीसर्ज, इन्द्रद्रु, वीरवृक्ष, वीर और धवल ये सब हैं। अर्जुन—कषाय रसयुक्त, शीतल, हृद्य (हृदय को हितकर) एवम्-क्षत, क्षय, विष, रक्तविकार, मेद, प्रमेह, व्रण (प्रमेह सम्बन्धी व्रण), कफ तथा पित्त का नाशक होता है। [२६-२७] १३. अर्जुन हिं०—अर्जुन, कहू, कोइ। बं०—अर्जुन गाछ। म०—अर्जुन, अर्जुन सादड़ा। गु०—अर्जुन। पं०—जुमरा। ते०—तेल्लमद्दि। क०—मन्त्रि। ता०—मरुदमरम्। ले०—Terminalia arjuna W. & A. (टर्मिनेलिया अर्जुन)। Fam. Combretaceae (कॉम्ब्रेतेसी)। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA