भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

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वटादिवर्गः ६८७ चरक चि० अ० १३ में रोहितक लता का उल्लेख है जिससे ऐसा मालूम पड़ता है कि कोई ऐसी लता भी थी जिसका उपयोग रोहीतक नाम से किया जाता था । गुण-कर्म—रोहीतक तिक्त, कषाय, शीत, कफ-पित्तशामक, सारक एवं यकृत्, प्लीहा, गुल्म एवं उदररोग को दूर करने वाली है । इसका यकृत् तथा प्लीहा वृद्धि में विशेष उपयोग किया जाता है । मात्रा—त्वक्चूर्ण १ से ३ माशा; क्वाथ में ½-१ तोला । अथ बब्बूलः (बबूर) । तस्य नामानि गुणांश्चाह बब्बूलः किङ्किरातः स्यात्किङ्किराटः सपीतकः ॥३६॥ स एव कथितस्तज्जैराभाष्टपद्मोदिनी । बब्बूलः कफनुद् ग्राही कुष्ठकृमिविषापहः ॥३७॥ बबूर के संस्कृत नाम—बब्बूल, किङ्किरात, किङ्किराट, सपीतक तथा आभाष्टपदभोदिनी ये सब द्रव्य-गुण के जानने वालों ने बतलाये हैं । बबूर—ग्राही एवम्-कफ, कुष्ठ, क्रिमि तथा विष का नाशक है । [३६-३७] ९९. बबूल हिं०—बबूर, बबूल, कीकर । बं०—बाबला । म०—बाभूल । गु०—बाबल । क०—पुलई । ते०—नल्लतुम्म । ता०—करू बेलमरम् । फा०—मुगिलाँ । अ०—अमुगिलाँ । ले०—Acacia arabica Willd. (अकेसिया अरेबिका) । Fam. Leguminosae (लेग्यु-मिनोसी) । यह सिंध तथा डेक्कन का आदिवासी होते हुए भी अब सभी स्थानों में पाया जाता है । इसका वृक्ष—मध्यमाकार का, कंटक युक्त, होता है । छाल—गहरे भूरे या काले रंग की एवं लम्बाई में फटी हुई होती है । पत्ते—संयुक्त; उपपक्ष ४-९ जोड़े, २.५ से० मी० लम्बे; पत्रक १०-२५ जोड़े, ३-६ × १.२-२ मि० मी० बड़े, रेखाकार होते हैं । पुष्प—चमकीले पीले, गोल एवं मधुर गन्धि होते हैं । फली—३-६ इञ्च लम्बी, ०.५ इञ्च चौड़ी, माला की तरह बीच-बीच में सिकुड़ी हुई, टेढ़ी, मृदु रोमश एवं ८-१२ बीजों से युक्त होती है । काँटे सीधे, नुकीले तथा पर्णवृन्त के नीचे जोड़ी में आते हैं । इसका गोंद विभिन्न आकार एवं नाप के टुकड़ों में, भूरा, लाल या हल्का पीला, गन्धहीन, स्वादहीन एवं अपने से दुगने जल में पूर्णतः घुलनशील होता है । इसका गोंद, छाल एवं फली का उपयोग किया जाता है । रासायनिक संगठन—गोंद में अरैबिक् ॲसिड के साथ बने चूना तथा मॅग्नेशियम् के लवण होते हैं । इसकी छाल में १२% तथा फली में २०% तक टैनिन होता है । गुण और प्रयोग—इसका गोंद स्नेहन, ग्राही तथा पौष्टिक है । मुख के छाले, शुष्क कास, गले का सूखना आदि में इसको चूसने से लाभ होता है । मूत्रकृच्छ्र, अतिसार तथा मधुमेह में इसको खिलाते हैं । इसकी छाल संग्राहक है । इसके क्वाथ के गण्डूष से मुखरोग, दाँत हिलना तथा गले की शिथिलता में लाभ होता है । इसकी फली का चूर्ण चीनी मिलाकर स्वप्नदोष, शीघ्रपतन आदि में देते हैं । मात्रा—फली चूर्ण ३ से ६ माशा; गोंद ३ से ६ माशा । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA