भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

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वटादिवर्गः ६९५ ५ से० मी० बड़ी, अग्र की तरफ एक बीज युक्त होती है। बीज-चिपटे, वृक्काकांर, २५-३८ मि० मी० लम्बे, १६- २५ मि० मी० चौड़े, १.५-२.० मि० मी० मोटे, रक्ताभ भूरे, चमकीले सिकुड़नयुक्त, स्वाद में कुछ कटु एवं तिक्त तथा गंध हलकी होती है। इसका गोंद (Bengal Kino-बंगाल किनो)-रक्तवर्ण, सूखने पर कृष्णाभरक्त, भंगुर और चमकदार होता है। इसके बीज, पुष्प तथा गोंद का उपयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन-बीजों में १८% स्वादहीन तेल, अलब्यूमिनाभ द्रव्य, शर्करा तथा पुष्पों में ग्लूकोसाइड १.५% पाया जाता है। गुण और प्रयोग-इसके बीज कृमिघ्न, भेदन तथा कुष्ठघ्न हैं। पुष्प-मूत्रजनन हैं। गोंद उत्तम ग्राही है। (१) इसके ताजे, कीड़ों द्वारा न खाये हुये बीज, केचुवे (राउण्डे वर्म) के लिये सैण्टोनिन की तरह लाभप्रद होते हैं। इसका स्वाद अच्छा नहीं रहता तथा कभी-कभी इससे मिचली, पेट में दर्द या वमन हो सकता है। छिलका निकाल कर बीज देने से दस्त नहीं होता किन्तु छिलके के साथ देने से दस्त होता है। (२) बीजों को नींबू के रस के साथ घिसकर दाद आदि चर्म रोगों में लगाते हैं। (३) गोंद अतिसार, प्रवाहिका तथा भोजनोपरान्त गले में खट्टा पानी आता हो तब देते हैं। (४) फूलों का फांट शोरे के साथ मूत्रावरोध में पिलाया जाता है तथा फूलों से पेडू, कमर आदि सेंकते हैं। मात्रा-बीजपूर्ण ५-१० रत्ती, गोंद ५-१५ रत्ती। अथ शाल्मलिः (सेमर)। तस्य नामानि गुणाँश्चाह शाल्मलिस्तु भवेन्मोचा पिच्छिला पूरणीति च। रक्तपुष्पा स्थिरायुश्च कण्टकाढ्या च तूलिनी ॥ ५४ ॥ शाल्मली शीतला स्वाद्धी रसे पाके रसायनी। श्लेष्मला पित्तवातास्रहारिणी रक्तपित्तजित् ॥ ५५ ॥ सेमर के संस्कृत नाम-शाल्मलि, मोचा, पिच्छिला, पूरणी, रक्तपुष्पा, स्थिरायु, कण्टकाढ्या तथा तूलिनी ये सब हैं। सेमर-रस तथा विपाक में मधुर रसयुक्त, शीतल, रसायन, कफजनक एवम्-पित्त, वात, रक्तविकार या वातरक्त तथा रक्तपित्त को दूर करने वाला होता है। इसके पुष्पों के गुण आगे शाकवर्ग में दिये हुये हैं। २८. सेमर हिं०-सेमर, सेमल। बं०-शिमुल गाछ, रक्ती सिमुल। म०-कांते सांवर, लाल सांवर। गु०-शेमलो, सीमुलो। ते०-बुरूग चेट्टु। ता०-शालवधु। मा०-शेमल, सरमली। अं०-Silk Cotton Tree (सिल्क काटन ट्री)। ले०-Bombax malabaricum DC. (बॉम्बैक्स मालावारिकम्)। Fam. Bombacaceae (बाम्बेकेसी)। सेमर-इस देश के प्रायः सब प्रान्तों के वन, उपवन और वाटिकाओं में उत्पन्न होता है। इसके वृक्ष-बहुत विशाल और मोटे हुआ करते हैं। डालियों पर छोटे-छोटे नुकीले काँटे होते हैं। सतिवन के पत्तों के समान इसके पत्ते-एक-एक डण्डी के अन्त में ५-७ फैले हुये होते हैं। फूल-लाल। पुष्पदल-मोटा, लुआवदार एवं २-३ इञ्च तक लम्बा होता है। फल-५-६ इञ्च लम्बे, लम्ब गोलाकार, काष्ठवत् एवं हरे होते हैं और उनके भीतर रेशम जैसी रूई तथा काले बीज होते हैं। इसके १-१।। साल के छोटे वृक्ष के मूल निकालकर सुखा लेते हैं जिन्हें सेमल मूसली कहा जाता है। इसके पुष्प, गोंद तथा कंद का उपयोग किया जाता है। गोंद का आगे स्वतंत्र वर्णन किया गया है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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