भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

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६९६ भावप्रकाशनिघण्टुः रासायनिक संगठन—बीजों में स्नेह २२.३% होता है। गुण और प्रयोग—सेमल मूसली स्नेहन, संग्राहक, पौष्टिक, बृंहण तथा वयःस्थापन है। जननेन्द्रिय पर इसकी कुछ उत्तेजक क्रिया होती है। (१) इसका १ तोला चूर्ण १ तोला चीनी के साथ १० तोले जल में घोलकर वाजीकरण के लिये पिलाते हैं। (२) कोमल फल मूत्रजनन होते हैं तथा मूत्रकृच्छ्र में बहुत लाभ करते हैं। यह पाठा की तरह मूत्रेन्द्रिय के लिये शामक होते हैं। (३) इसके पुष्प, पोस्ते का बीज, चीनी एवं दूध उबालकर अर्श में दिन में ३ बार पिलाते हैं। (४) गाँठों की सूजन पर पत्तों को पीसकर लगाते हैं। (५) इसके कांटों को मुहाँसे आदि पर लगाने से लाभ होता है। मात्रा—सेमल मूसली चूर्ण ½-१ तोला; फल चूर्ण १ से ३ माशा; पुष्प १ से २ तोला। अथ मोचरसः । तस्य नामानि गुणाँश्चाह निर्यासः शाल्मलेः पिच्छा शाल्मलीवेष्टकोऽपि च। मोचास्रावोमोचरसो मोचनिर्यास इत्यपि ॥५६॥ मोचास्रावो हिमो ग्राही स्निग्धो वृष्यः कषायकः । प्रवाहिकाऽतिसारामकफपित्तास्रदाहनुत् ॥५७॥ मोचरस के संस्कृत नाम—शाल्मलिनिर्यास, पिच्छा, शाल्मलीवेष्टक, मोचास्राव, मोचरस और मोचनिर्यास ये सब हैं। मोचरस—कषाय रसयुक्त, शीतल, ग्राही, स्निग्ध, वृष्य (वीर्यवर्धक) एवम्–प्रवाहिका अतिसार, आम, कफ, पित्त, रक्तविकार तथा दाह को दूर करने वाला होता है। [५६-५७] २९. मोचरस हिं०-मोचरस, सेमर का गोंद। बं०-मोचरस, शिमुलेर आटा। म०-सांवरी चा डीक। गु०-शेमलानो गुन्द। अं०-Gum of Silk Cotton Tree (गम् आफ् सिल्क काटन ट्री)। सेमर वृक्ष के गोंद को “मोचरस” कहते हैं। यह सेमर वृक्ष के स्तम्भ से जहाँ कीड़े आदि डंक से छिद्र कर देते हैं निकलता है। यह ताजेपन में भूरे रंग का, फिर लाल होता है तथा पुराना होने पर काला सीसम के रंग का हो जाता है। यह भंगुर, पोला तथा हलका होता है। जल में डालने पर यह फूलता है। इसका स्वाद कषाय होता है। रासायनिक संगठन—इसमें कँटेचूटैनिक एसिड (Catechutannic acid) रहता है। गुण और प्रयोग-यह कषाय, शोणितास्थापन, वेदनास्थापन, स्नेहन, जोरदार संग्राहक एवं बल्य होता है। इसका उपयोग जीर्ण अतिसार, संग्रहणी आँव तथा अत्यार्तव में किया जाता है। मात्रा-१ से ३ माशा। अथ कूटशाल्मलिः (कालासेमर) । तस्य नामानि गुणाँश्चाह कुत्सितः शाल्मलिः प्रोक्तो रोचनः कूटशाल्मलिः। कूटशाल्मलिकस्तिक्तः कटुकः कफवातनुत् ॥५८॥ भेद्युष्णः प्लीहजठरयकृद्गुल्मविषापहः। भूतानाहविबन्धास्रमेदः शूलकफापहः ॥५९॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA