भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६९८ भावप्रकाशनिघण्टुः ३१. धौरा हिं०-धौरा, धौ, धव, धों, धववृक्ष। बं०-धाउया गाछ। म०-धावड़ा, धामोड़ा, धवल। गु०-धावड़ो। क०-दिदुंग। ते०-येल्लमद्दि। अं०-Axle-wood (ॲक्सेल-वुड)। ले०-Anogeissus latifolia Wall. (एनोजिसस् लेटीफोलिया)। Fam. Combretaceae (कॉम्ब्रेटेसी)। यह पूर्व बंगाल तथा आसाम को छोड़कर प्रायः सब प्रान्तों में कहीं-न-कहीं पाया जाता है। इसका वृक्ष-बड़ा या मध्यम ऊँचाई का होता है। छाल-१/४ इञ्च मोटा, चिकनी, श्वेताभ धूसर एवं पपड़ी छूटने के कारण कुछ गढ़ेदार होती है। पत्ते-चौड़े, आयताकार, अंडाकार, २-४ इञ्च लम्बे, कुण्ठित या गोलाग्र, सनाल एवं पृष्ठ पर बिन्दुकित होते हैं। फरवरी में गहरे लाल रंग के पत्र गिरते हैं तथा मार्च अप्रैल तक वृक्ष पर्णहीन रहता है। पुष्प-छोटे, हरिताभ, मुण्डक के रूप में सितम्बर से जनवरी तक आते हैं। फल-चिपटे, द्विपक्ष, चोंचदार एवं दिसम्बर से मार्च तक पकते हैं। इसकी लकड़ी बहुत मजबूत और लचकदार होती है और गाड़ी के धूरे तथा औजारों की मुठियाँ आदि बनाने के काम आती हैं। इसका पर्याय धुरन्धर तथा व्यापारी नाम Axle-wood इसीलिये पड़ा है। इससे गोंद प्राप्त होता है जो बबूल के गोंद के स्थान पर प्रयोग किया जा सकता है। रासायनिक संगठन-इसकी छाल तथा पत्तों में टैनिन (Tannin) बहुत होता है। अतिसार, प्रवाहिका, अर्श रक्तपित्त, प्रमेह एवं विष में किया जाता है। मात्रा-क्वाथ ५ से १० तोला; गोंद ५ से १० रत्ती। अथ धन्वङ्गः (धामिन) तस्य नामानि गुणाँश्चाह धन्वङ्गतु धनुर्वृक्षो गोत्रवृक्षः सुतेजनः ।।६१।। धन्वङ्गः कफपित्तास्रकासहत्तुवरो लघुः । बृंहणो बलकृद्रूक्षः सन्धिकृद् व्रणरोपणः ।।६२।। धामिन के संस्कृत नाम-धन्वङ्ग, धनुर्वृक्ष, गोत्रवृक्ष तथा सुतेजन ये सब हैं। धामिन-कषाय रस युक्त, लघु, बृंहण (रस-रक्तादि-वर्धक), बलकारक, रूक्ष, सन्धानकारक (अस्थियों को टूटने पर जोड़ने वाला), व्रण का रोपण करने वाला एवं-कफ-पित्त, रक्तविकार तथा खाँसी को दूर करने वाला है। [६१- ६२] ३२. धामिन हिं०-धामिन, धामन। म०-धामणीचा वृक्ष। गु०-धामण। बं०-धामना गाछ। ते०-चरचि। ता०-सहचि, थड़। क०-बुतले। ले०-Grewia tiliaefolia Vahl. (ग्रोविआ टिलीफोलिया)। Fam. Tiliaceae (टिलीएसी)। यह हिमालय पहाड़ के निचले भागों में जमुना से नेपाल तक, ४००० फीट की ऊँचाई तक एवं मध्य भारत, मद्रास, बिहार एवं उड़ीसा में पाया जाता है। इसका वृक्ष-मध्यमाकार का होता है। पत्ते-२ से ५ इञ्च तक लम्बे तथा १ से ४ इञ्च तक चौड़े, अंडाकार, मध्यशिरा के दोनों ओर के भाग छोटे-बड़े, प्रायः कुण्ठिताग्र, गोल दन्तुर, आधार का भाग एक ओर अत्यधि बढ़ा हुआ एवं १ इञ्च लम्बे वृन्त से युक्त होते हैं। पुष्प-सफेद रंग के छोटे-छोटे फूलों के गुच्छे लगते हैं जिनके भीतर पीलापन झलकता है। फल-२ से ४ खण्ड के, मटर के समान एवं पकने पर काले पड़ जाते हैं। इसके फल खाने लायक खट्टे होते हैं। इसकी छाल का उपयोग किया जाता है। यह बाहर से धूसर या गहरे भूरे रंग की तथा मोटी होती है। पत्तों को बाल धोने के लिये काम में लाया जाता है। लकड़ी का भी उपयोग फर्नीचर इत्यादि बनाने के लिये किया जाता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA