भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवटादिवर्गः ६९९ गुण और प्रयोग—इसकी छाल कटु, मधुर, शीत, स्नेहन तथा रक्तसंग्राहिक होती है। (१) इसके अन्तर्छाल का रस १ से २ तोले की मात्रा में रक्त युक्त आँव में पिलाया जाता है। (२) केंवाच की फली शरीर में लगने से खुजली होने पर छाल को शरीर पर मलते हैं जिससे त्वरित आराम मिलता है। (३) अफीम के विष को उतारने के लिये इसकी लकड़ी का कोयला वमन कराने के लिये देते हैं। मात्रा—छाल स्वरस १ से तोला। अथ करीरः । तस्य नामानि गुणाँश्चाह करीरः क्रकरीपत्रो ग्रन्थिलो मरुभूरुहः । करीरः कटुकस्तिक्त स्वेद्यष्णो भेदनः स्मृतः ।। दुर्नामकफवातामगरशोथव्रणप्रणुत् ।।६३।। करील के संस्कृत नाम—करीर, क्रकरीपत्र, ग्रन्थिल तथा मरुभूरूह ये सब हैं। करील—कटु तथा तिक्त रस युक्त, स्वेदजनक, उष्ण, मल का भेदन करने वाला एवम्—अर्श, कफ, वात, आम, विष, शोथ तथा व्रण को दूर करने वाला होता है। [६३] ३३. करील हिं०—करीर, करील, करेल । बं०—करील । म०—नेवती, किरल, सोदद । गु०—केरडो, केर । क०—चिप्पुरी । ते०—करीरमु । फा०—सोदाव । ता०—सेंगम् । ले०—Capparis aphylla Roth. (कॅपेरिस् एफिला) । Fam. Capparidaceae (कॅपेरीडेसी) । यह पंजाब, सिंध, कच्छ, प० राजपुताना, गुजरात एवं दक्षिण के उत्तरी भाग में शुष्कं प्रदेशों में होता है। इसका वृक्ष—झाड़दार, काँटेदार, घना, वारीक शाखाओं से भरा हुआ एवं ६-७ फीट तक ऊँचा होता है। पत्ते—केवल नवीन शाखाओं पर होते हैं तथा ये १/२ इञ्च लम्बे, रेखाकार, नोकीले, स्वाद में कटु तथा शीघ्र ही गिर जाते हैं। फूल—गुलाबी रंग के, ४/५ इञ्च व्यास के गुच्छों में वसन्त ऋतु में फूलते हैं। फल—गोल १/२-३/४ इञ्च व्यास के, लाल या गुलाबी एवं छोटे से वृन्त पर आते हैं। इसकी कली एवं फलों का अचार बनाते हैं। औषध में कली, फल तथा छाल का उपयोग करते हैं। गुण और प्रयोग—इसकी छाल तिक्त एवं संसन, स्वेदजनन, अर्शोघ्न एवं शोथहर है। कोमल पत्ते तथा शाखा स्फोटनजनन होते हैं। फल संग्राहक होते हैं। (१) दंतशूल में पत्ते तथा नवीन शाखाएँ चबाने को देते हैं। सूजन, फोड़े आदि पर इसे लगाने से लाभ होता है। (२) अतिसार तथा पुरानी आँव में फलों का अचार देते हैं। (३) मूल तथा मूल की छाल आमवात तथा विषमज्वर में दी जाती है। मात्रा—त्वक् चूर्ण १ से २ माशा। अथ शाखोटः (सहोरा) । तस्य नामानि गुणाँश्चाह शाखोटः पीतफल