भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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७०० भावप्रकाशनिघण्टुः ३४. सिहोरा हिं०-सहोरा, सिहोड़ (ड़ा), सिहोर। बं०-शेओडा। म०-सहोड़, करवती। गु०-साहोड़ा। ते०-भारिणिके चेट्टु। ता०-पिरे। क०-आखोड्। ले०-Streblus asper Lour. (स्ट्रेब्लस् अस्पेर्)। Fam. Moraceae (मोरेसी)। सहोरे के वृक्ष जांगल देशों के अधिक शुष्कभागों में रुहेलखंड से पूर्व और दक्षिण की ओर त्रावनकोर तक तथा बंगाल, बिहार, मध्य प्रदेश आदि प्रान्तों में अधिक होते हैं। ये क्षीरी वृक्ष-अत्यन्त गठीले, झाड़दार और मध्यमाकार तथा २० फीट तक ऊँचे होते हैं। इसके पत्ते कुछ गोल, छोटे-छोटे, दोनों ओर से खुरदरे और २-४ इञ्च लम्बे होते हैं। उन पर छोटी-छोटी उठी हुई बूंदें होती हैं। फूल-सफेद रंग के, पुरुष और स्त्रीजाति के अलग-अलग लगते हैं। फल-पीले रंग के और उनमें एक-एक बीज निकलते हैं। पौष से फाल्गुन महीने तक इसके फूल लगते हैं और वैशाख से आषाढ़ तक फल पक जाते हैं। बकरी के दूध में इसके क्षीर को डालने से दूध जम जाता है। (रा० नि०)। इसकी छाल एवं क्षीर का उपयोग करते हैं। रासायनिक संगठन-इसकी छाल में तिक्त द्रव्य पाया जाता है। गुण और प्रयोग-(१) इसकी छाल का क्वाथ ज्वर, अतिसार तथा प्रवाहिका में दिया जाता है। गोमूत्र के साथ क्वाथ को श्लीपद में देते हैं। (२) इसके मूल को पुराने व्रण तथा नाड़ी व्रण में लगाते हैं। हाथ पैर फटने पर इसका दूध लगाते हैं। अथ वरुणः (बरना)। तस्य नामानि गुणाँश्चाह वरुणो वरणः सेतुस्तिक्तशाकः कुमारकः। वरुणः पित्तलो भेदीश्लेष्मकृच्छ्राश्ममारुतान् ॥६५॥ निहन्ति गुल्मवातास्रकृमींश्चोष्णोऽग्निदीपनः। कषायो मधुरस्तिक्तः कटुकोरूक्षको लघुः ॥६६॥ बरना के संस्कृत नाम-वरुण, वरण, सेतु, तिक्तशाक और कुमारक ये सब हैं। बरना-कषाय, मधुर, तिक्त तथा कटु रस युक्त, रूक्ष, लघु, पित्तजनक, मल का भेदन करने वाला, उष्ण, अग्निदीपक एवं-कफ, मूत्रकृच्छ्र, पथरी, वायु, गुल्म, वातरक्त तथा कृमि को दूर करने वाला होता है। [६५-६६] ३५. बरना हिं०-बरुन, बरना। बं०-बरुन गाछ, बरुण गाछ। म०-वायवर्णा। गु०-बरणो, कागडाकेरी। क०- नारूवे। ते०-मर्गलिंगम्। ता०-मरलिंगम्। ले०-Crataeva nurvala Buch.-Ham. (क्रे० नुर्वाला)। Fam. Capparidaceae (कैपेरीडेसी)। यह मालाबार और कनारा में नदियों के आसपास पाया जाता है तथा सभी स्थानों पर लगाया हुआ भी होता है। इसका वृक्ष-मध्यमाकार का होता है और शाखाएँ-फैली हुई रहती हैं। छाल-आध इञ्च मोटी सफेद रंग की होती है। टहनियों पर सफेद दाग होते हैं। पत्ते-तीन-तीन पत्रकों के पाणिवत् सदल पर्ण होते हैं जो बेल की तरह किन्तु लम्बे वृन्त से युक्त दिखलाई देते हैं। पत्रक-लट्वाकार या भालाकार एवं लम्बाग्र होते हैं। पुष्प-श्वेत, पीत या गुलाबी, भिन्न-भिन्न रंग के होते हैं। फल-नीबू के आकार के तथा पकने पर लाल हो जाते हैं। पत्तों का स्वाद कड़वा तथा उन्हें मसलने से उग्र गंध आती है। इसकी छाल, पत्ते तथा पुष्पों का उपयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन-छाल में सैपोनिन तथा टैनिन पाया जाता है।