भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

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वटादिवर्गः ७०१ गुण और प्रयोग—यह तिक्त, उष्ण, वातनाशक, दीपन, संसन, मूत्रजनन, अश्मरीघ्न एवं शोथघ्न है। ताजे पत्तों का लेप करने से त्वचा लाल हो जाती है तथा फोड़े निकल आते हैं। (१) अश्मरी, शर्करा, बस्तिशूल, मूत्रकृच्छ्र आदि मूत्रविकारों में इसकी छाल का प्रयोग अपामार्ग, पुनर्नवा, यवक्षार, गोखुरू, मुलेठी इत्यादि के साथ किया जाता है। (२) मूल का क्वाथ मिलाकर गण्डमाला तथा अपक्व विद्रधि में दिया जाता है। (च० द०)। गण्डमाला में लेप भी किया जाता है। क्वाथ में सोंठ एवं कचनार की छाल भी मिलाई जा सकती है। (३) पेट फूलना तथा कुपचन में पत्तों का फाट बनाकर देते हैं। इससे वमन बन्द होता है। (४) पत्तों का साग मेद कम करने के लिये खिलाते हैं। (५) पुष्प ग्राही तथा पित्तविरेचक माने जाते हैं। मात्रा—क्वाथ ५ से १० तोला; मूल या त्वक् चूर्ण ३-६ माशा। अथ कटभी। तस्य नामानि तत्फलस्य च गुणाँश्चाह कटभी स्वादुपुष्पश्च मधुरेणुः कटम्भरः। कटभी तु प्रमेहार्शोनाडीव्रणविषक्रिमीन् ।।६७।। हन्त्युष्णा कफकुष्ठघ्नी कटू रूक्षा च कीर्तिता। तत्फलं तुवरं ज्ञेयं विशेषात्कफशुक्रहत् ।।६८।। कटभी के संस्कृत नाम—कटभी, स्वादुपुष्प, मधुरेणु तथा कटम्भर ये सब हैं। कटभी—कटुरसयुक्त, रूक्ष, उष्ण एवम्-प्रमेह, अर्श, नाडीव्रण (नासूर), विष, क्रिमि, कफ तथा कुष्ठ को नाश करने वाली होती है। कटभी का फल—कषाय रस युक्त तथा विशेषतः कफ और शुक्र का नाशक होता है। [६७-६८] ३६. कटभी ? कुम्भी, कुम्भीर नोट—कटभी के संबंध में विद्वानों में मतभेद है। ज्योतिष्मती का नाम भी कटभी दिया हुआ है। श्री ठा० बलवन्तसिंह जी श्वेत शिरीष, आलबीजिया प्रोसेरा (Albizzia procera) को कटभी मानते हैं। श्री बापालाल शाह वैद्य कॅरेया आबोरिया (Careya arborea) को कटभी कुम्भी दोनों मानते हैं जिसे अन्य विद्वानों ने केवल कुम्भी माना है। शिरीष के अन्तर्गत श्वेत शिरीष का वर्णन किया जा चुका है जिसके कटभी होने की अधिक संभावना है। यहाँ संक्षेप में कुम्भी का भी वर्णन किया जा रहा है। हिं०, बं०—कुम्भी। म०—कुम्भा। ले०—Careya arborea Roxb. (कॅरेया आबोरिया)। Fam. Lecythidaceae (लेसीथीडेसी) । यह हिमालय के निचले भागों में काँगड़ा से लेकर पूर्व में बंगाल तथा मध्य, पश्चिम एवं दक्षिण भारत में ५००० फीट तक होता है। इसके वृक्ष—छोटे या मध्यम ऊँचाई के होते हैं। पत्ते—बहुत बड़े, ६-१५ इञ्च लम्बे, अभि लट्वाकार (ऊपर की ओर चौड़े तथा नीचे की ओर संकुचित), चिकने, गोल दन्तुर एवं टहनियों के अग्रपर समूहबद्ध होकर रहते हैं। पुष्प— श्वेत या गुलाबी, गुच्छे में रहते हैं। फल—गोलाई लिये हुये, हरे, २ ½-३ व्यास के एवं शीर्ष पर बाह्यनाल से युक्त रहते हैं। इसकी छाल का प्रयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन—इसकी छाल उत्तम स्तम्भन है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA