भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७०२ भावप्रकाशनिघण्टुः (१) सूखी खाँसी में छाल के क्वाथ से कुल्ला कराते हैं तथा इसकी गोली चूसने को देते हैं। खाँसी में ताजी छाल का रस या पुष्प मधु के साथ देते हैं। (२) प्रदर में छाल को ६ से १२ रत्ती की मात्रा से घृत एवं मधु के साथ देते हैं। विस्फोटक ज्वर जैसे मसूरिका में ज्वर तथा कण्डू दूर करने के लिये छाल का प्रयोग करते हैं। (३) पीड़ा युक्त शोथ तथा व्रण पर छाल को पीस कर बाँधते हैं तथा व्रण प्रक्षालन के लिये इसका क्वाथ प्रयोग करते हैं। (४) सर्प विष में छाल का रस पिलाते हैं तथा पीसकर दंश स्थान पर बाँधते हैं। मात्रा-छाल १ से ३ माशा। अथ मोक्षः (मोखावृक्ष) पलाशवत्पर्वतवृक्षः । तस्य नामानि गुणांश्चाह मोक्षस्तु मोक्षकोऽपि स्याद् गोलीढोगोलिहस्तथा । क्षारश्रेष्ठः क्षारवृक्षो द्विविधः श्वेतकृष्णकः ॥६९॥ मोक्षकः कटुकस्तिक्तो ग्राह्युष्णः कफवातहृत् । विषमे दोगुल्मकण्डूबस्तिरुक्कृमिशुक्रनुत् ॥७०॥ मोखा के संस्कृत नाम-मोक्ष, मोक्षक, गोलीढ, गोलिह, क्षारश्रेष्ठ तथा क्षारवृक्ष ये सब हैं। यह सफेद तथा काले के भेद से दो प्रकार का होता है। मोखा-कटु तथा तिक्त रसयुक्त, ग्राही, उष्ण एवम्-कफ, वात, विष, मेद, गुल्म, खुजली, बस्तिसम्बन्धी रोग, कृमि तथा शुक्र का नाशक है। [६९-७०] नोट-गुडूच्यादिवर्ग में पाटला के भेद में मोक्षक को बतलाया गया है किन्तु मोक्षक यह उससे भिन्न है। इसी प्रकार इसमें भी दो भेद श्वेत एवं कृष्ण, भावप्रकाशकार ने माने हैं। यहाँ दोनों का वर्णन किया गया है। मोक्षक अधिकतर श्वेत को कहा गया है। ३७. मोखा सं०-मोक्षक, श्वेत मोक्षक। हिं०-मोखा, एकसिरा। बं०-घण्टा पारुल। म०-मोखाडा। ता०-मगलिंगम्। ते०-मगलिंग। ले०-Schrebera swietenioides Roxb. (श्रेबेरा स्वीटेनियोइडिस्)। Fam. Oleaceae (ओलिएसी)। यह कुमाऊँ से पूर्व, मध्यभारत तथा राजपूताना में पाया जाता है। इसका वृक्ष-मध्यम ऊँचाई का होता है। पत्ते-पक्षवत् सदल होते हैं। पत्रक-संख्या में ३-७, लट्वाकार, आयताकार या लट्वाकार-प्रासवत्, ३-७ इञ्च लम्बे, फलक क्रमशः संकुचित होकर सूक्ष्म वृन्त से युक्त और अग्र किंचित् लम्बाग्र होता है। पुष्प-श्वेताभ, बाह्यकोश घंटिकाकार और आभ्यंतर कोश व्यस्त छात्राकार होते हैं। फल-नीचे की ओर लटका हुआ, नाशपाती के आकार का, २.५ इञ्च लम्बा तथा १ इञ्च चौड़ा होता है। बीज-प्रत्येक कोष्ठ में २-४ कोनदार सपक्षक बीज होते हैं। गुण और प्रयोग-इसके जड़ से सिद्ध घृत कुष्ठ में लाभदायक है। (सु० चि० अ० ९)। इसका क्षार अच्छा माना गया है तथा मुखरोग तथा ग्रहणी आदि में लाभदायक बताया गया है। बिहार में आदिवासियों में बच्चों के अंडकोश बढ़ने पर इसके फल को कमर में बाँधने की प्रथा है।