भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 760, कुल 1167 में से

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आम्रादिफलवर्गः ७०९ वृक्ष ही में पका हुआ आम का फल—वृक्ष में यदि आम पका हो तो वह मधुर तथा अम्ल रस युक्त, गुरु, अत्यन्त वातनाशक तथा किञ्चित् पित्त को प्रकुपित करने वाला होता है। [६] अथ कृत्रिमपक्वचूषिताम्रफलगुणानाह आम्रं कृत्रिमपक्वञ्च तद्भवेत्पित्तनाशनम्। रसस्याम्लस्य हीनस्तु माधुर्याच्च विशेषतः ।।७।। चूषितं तत्परं रुच्यं बलवीर्यकरं लघु। शीतलं शीघ्रपाकि स्याद्वातपित्तहरं सरम् ।।८।। कृत्रिम रीति से पकाये हुए (पाल के) आम के फल—यदि आम का फल कृत्रिम रीति से पकाया गया हो तो वह पित्तनाशक होता है क्योंकि उसमें का अम्ल रस निकल जाता है तथा मधुर रस की विशेषता हो जाती है। वह यदि चूसा जाय तो अत्यन्त रुचिजनक, बल वीर्य-कारक, लघु, शीतल, शीघ्र हजम होने वाला, सारक एवम् वात-पित्त नाशक है। [७-८] अथ गलिताम्ररसगुणानाह तद्रसो गालितो बल्यो गुरुर्वातहरः सरः। अहृद्यस्तर्पणोऽतीव बृंहणः कफवर्धनः ।।९।। निचोड़े आम का रस—बलकारक, गुरु, वातनाशक, सारक, हृदय के लिये अहितकर, अत्यन्त सन्तर्पण करने वाला, बृंहण रस रक्तादि वर्धक एवं कफ की वृद्धि करने वाला होता है। [९] अथाम्रखण्डगुणानाह तस्य खण्डं गुरु परं रोचनं चिरपाकि च। मधुरं बृंहणं बल्यं शीतलं वातनाशनम् ।।१०।। पके आम के टुकड़े—गुरु, अत्यन्त रोचक, देर में हजम होने वाले, मधुर रस युक्त, बृंहण (रस रक्तादि वर्धक), बलकारक, शीतल एवम् वातनाशक होते हैं। [१०] अथ दुग्धयुक्ताम्रगुणानाह वातपित्तहरं रुच्यं बृंहणं बलवर्धनम्। वृष्यं वर्णकरं स्वादु दुग्धाम्र गुरु शीतलम् ।।११।। दुग्धाम्र (दूध के साथ खाने पर) पका आम का फल—स्वादिष्ट, वातपित्त नाशक, रोचक, बृंहण, बलवर्धक, वृष्य (वीर्यवर्धक), वर्ण को उत्तम करने वाला, गुरु तथा शीतल होता है। [११] अथाम्रातियोगः (आम बहुत खाना)। तस्य दोषानाह मन्दानलत्वं विषमज्वरं च रक्तामयं बद्धगुदोदरं च। आम्रातियोगो नयनामयं वा करोति तस्मादति तानि नाद्यात् ।।१२।। एतदम्लाम्रविषयं मधुराम्लपरं न तु। मधुरस्य परं नेत्रहितत्वाद्या गुणा यतः ।।१३।। आम्रातियोग (अधिक आम खाने) के दोष—जठराग्नि की मन्दता, विषमज्वर, रक्तसम्बन्धी रोग, अत्यन्त मल का अवरोध और नेत्र सम्बन्धी रोग उत्पन्न करता है। इसलिये अधिक आम नहीं खाना चाहिये। यह निषेध अम्ल (खट्टे) आम के विषय में है न कि मधुर तथा अम्ल रस युक्त आम के विषय में है, क्योंकि मधुर रस में नेत्रों को हित पहुँचाना आदि गुण वर्तमान ही हैं। [१२-१३] अथाम्रातियोगदोषनिवृत्त्युपायमाह शुण्ठ्यम्भसोऽनुपानं स्यादाम्राणामतिभक्षणे। जीरकं वा प्रयोक्तव्यं सह सौवर्चलेन च ।।१४।। आम्रातियोग से उत्पन्न हुए दोषों की निवृत्ति का उपाय—आम अधिक खा लेने पर सोंठ के साथ जल पीना चाहिये अथवा सोंचल नोन के साथ जीरा खाना चाहिये। [१४] CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA

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