भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७१४ भावप्रकाशनिघण्टुः **गुण और प्रयोग—**इसका पका फल गुरु, शीत, मृदु सारक, वृष्य, बृंहण, तर्पण तथा बल्य है किन्तु कच्चा विबन्धकारक होता है। पत्तों का चर्म विकारों में प्रयोग करते हैं। क्षीर का लेप फोड़े आदि पकाने के लिये करते हैं। अथ लकुचः (बडहर) । तन्नामानि तत्पक्वफलगुणाँश्चाह लकुचः क्षुद्रपनसो लिकुचो बहुरित्यपि। आमं लकुचमुष्णाञ्च गुरु विष्टम्भकृत्तथा ॥३०॥ मधुरञ्च तथाऽम्लञ्च दोषत्रितयरक्तकृत्। शुक्राग्निनाशनं वाऽपि नेत्रयोरहितं स्मृतम् ॥३१॥ सुपक्वं तत्तु मधुरमम्लं चानिलपित्तहृत्। कफवह्विकरं रुच्यं वृष्यं विष्टम्भकञ्च तत् ॥३२॥ बड़हर के संस्कृत नाम—लकुच, क्षुद्रपनस, लिकुच तथा डहु ये सब हैं। **बड़हर के कच्चे फल—**उष्ण, गुरु, विष्टम्भकारक, मधुर तथा अम्लरस युक्त, त्रिदोष एवं रक्त विकार को उत्पन्न करने वाले, शुक्र और जठराग्नि को नष्ट करने वाले तथा नेत्रों के लिये अहितकर होते हैं। **पके फल—**मधुर तथा अम्ल रसयुक्त, वात तथा पित्त के नाशक, कफ और जठराग्नि के वर्धक, रोचक, वृष्य (वीर्यवर्धक) तथा विष्टम्भक होते हैं। [३०-३२] ६. बड़हल हिं०—बड़हल (र, बरहर, बरहल)। बं०—डेओ, मादार, डेलो, डहुया। म०—वोटोंबा। गु०—लकूच। ता०— इलगुसम्। ते०—कम्मरेगु। अं०—Monkey Jack (मंकीजॅक्)। ले०—Artocarpus lakoocha Roxb. (आर्टोकार्पस् लकूच)। Fam. Moraceae (मोरेसी)। यह गरम प्रान्त में कुमायूँ से पूरब की ओर और दक्षिण में त्रावनकोर तक तथा अनेक प्रान्तों में उत्पन्न होता है। बड़हर का **वृक्ष—**२० से ३० फीट ऊँचा होता है। इसके **पत्ते—**५ से १२ इञ्च लम्बे, २ से ६ इञ्च चौड़े, अण्डाकृति तथा रूक्ष होते हैं। **पुष्प—**एकलिङ्गी होते हैं। **फल—**गोल गाँठदार, २ से ४ इञ्च व्यास के होते हैं। कच्चे में हरे तथा स्वाद में खट्टे और पकने पर मटमैले पीले रंग के और स्वाद में खट्टेमीठे होते हैं। इनके भीतर कटहर के समान रेशा और बीज होते हैं पर कटहर से छोटे होते हैं। इसलिये इसको क्षुद्रपनस भी कहते हैं। वसन्त ऋतु में यह फूलता तथा वर्षा में फलता है। **रासायनिक संगठन—**छाल में ८.५% टैनिन होता है। इसके फल में रंजक द्रव्य इसकी अन्य जाति (Species) की अपेक्षा अधिक होता है। **गुण और प्रयोग—**इसके बीज विरेचक होते हैं। विरेचन के लिये एक दो बीज या थोड़ा सा क्षीर देते हैं। छाल का चूर्ण व्रण पर डालते हैं जिससे मवाद सूख जाता है तथा फांट से फुन्सियाँ तथा व्रण आदि धोते हैं। इसके फल को अहिततम (निकृष्टतम) बतलाया गया है। (अ० हृ० सू० अ० ६)। अथ कदली (केला) । तन्नामानि तत्पक्वापक्वफलगुणाँश्चाह कदली वारणा मोचाऽम्बुसाराऽंशुमतीफला। मोचाफलं स्वादु शीतं विष्टम्भि कफकृद्गुरु¹ ॥३३॥ स्निग्धं पित्तास्रतृड्दाहक्षतक्षयसमीरजित्। पक्वं स्वादु हिमं पाके स्वादु वृष्यञ्च बृंहणम्॥ क्षुत्तृष्णानेत्रगद्दहन्मेघ्नं रुचिमांसकृत् ॥३४॥ **केला के संस्कृत नाम—**कदली, वारणा, मोचा, अम्बुसारा तथा अंशुमतीफला ये सब हैं। १. कफनुद इति पाठ०।