भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआम्रादिफलवर्गः ७१३ अथ पनसः (कटहल) । तन्नामानि तत्पक्वापक्वफलगुणाँश्चाह पनसः कण्टकिफलः पलसोऽतिबृहत्फलः । पनसं शीतलं पक्वं स्निग्धं पित्तानिलापहम् ।। २५ ।। तर्पणं बृंहणं स्वादु मांसलं श्लेष्मलंभृशम् । बल्यं शुक्रप्रदं हन्ति रक्तपित्तक्षतव्रणान् ।। २६ ।। आमं तदेव विष्टम्भि वातलं तुवरं गुरु । दाहकृन्मधुरं बल्यं कफमेदोविवर्द्धनम् ।। २७ ।। कटहर के संस्कृत नाम—पनश कण्टकिफल, पलस तथा अतिबृहत्फल ये सब हैं। कटहर के पके फल—शीतल, स्निग्ध, पित्त तथा वात के नाशक, सन्तर्पणकारक, बृंहण, स्वादिष्ट, मांस तथा कफ की अत्यन्त वृद्धि करने वाले, बलदायक, शुक्रजनक एवम् रक्तपित्त, क्षत तथा व्रण को दूर करनेवाले होते हैं। वे ही यदि कच्चे हों तो विष्टम्भकारक, वातजनक, कषाय तथा मधुररसयुक्त, गुरु, दाहकारक, बलदायक, कफ तथ मेद की वृद्धि करने वाले होते हैं। [२५-२७] अथ पनसबीजगुणानाह पनसोद्भूतबीजानि वृष्याणि मधुराणि च । गुरूणि बद्धविट्कानि सृष्टमूत्राणि संवदेत् ।। २८ ।। कटहर के बीज—वृष्य (वीर्यवर्धक), मधुर रस युक्त, गुरु, मल को बाँधने वाले एवम् मूत्र की प्रवृत्ति करानेवाले होते हैं। [२८] अथ पनसमज्जगुणानाह मज्जा पनसजो वृष्यो वातपित्तकफापहः । विशेषात्पनसो वर्ज्यो गुल्मिभिर्मन्दवह्निभिः ।। २९ ।। कटहल के बीज की मींगी—वृष्य (वीर्यवर्धक) एवम् वात, पित्त तथा कफ की नाशक होती है। विशेष रूप से कटहल खाना गुल्म तथा मन्दाग्निरोगवाले रोगियों को छोड़ देना चाहिये। ५. कटहर हिं०—कटहर, कटहल, कठैल। बं०—कांटाल। म०—फणस। गु०—फनस। क०—हलसु। ते०—पनसकायि। ता०—पेलाकायि। अं०—Jack Tree (जैक ट्री)। ले०—Artocarpus integrifolia Linn f. (आर्टोकार्पस् इण्टेग्रिफोलिया)। Fam. Moraceae (मोरेसी)। कटहर—विशेष कर गरम प्रान्तों में रोपण किया जाता है। पश्चिम घाट के जङ्गलों में यह आप ही आप उत्पन्न होता है और दक्षिण, बिहार तथा बंगाल में अधिक होता है। इसका वृक्ष—बड़ा होता है। छाल—खुरदरी रहती है जिससे दुधिया क्षीर निकलता है। पत्ते—४-८ इञ्च लम्बे, कुछ चौड़े, मोटे, किंचित् अण्डाकार और किंचित् कालापन युक्त हरे रंग के होते हैं। स्तम्भ और मोटी शाखाओं पर फूल फल लगते हैं। फूल—२ से ६ इञ्च तक लम्बे, १-२ इञ्च गोल अंडाकार और किंचित् पीले रंग के होते हैं। फल— बहुत बड़े-बड़े, १-२ फीट एवं लम्बाई युक्त गोल होते हैं। उसके ऊपर कोमल काँटे होते हैं। गूदा—बीज के चारों तरफ लिपटा हुआ मोटा होता है जो कच्ची अवस्था में सफेद तथा पकने पर पीला हो जाता है। कच्चे फलकी तरकारी बनाते हैं तथा पके फल को खाते हैं। बीजों में स्टार्च रहता है जिन्हें पकाकर खाते हैं। रासायनिक संगठन—फलों में विटामिन ‘ए’ तथा ‘सी’ तथा लौह, खटिक एवं फास्फोरस तथा प्रोटीन आदि द्रव्य होते हैं। बीजों में विटामिन बी<sub>१</sub> तथा बी<sub>२</sub> पाये जाते हैं। काष्ठ में पीत रंजक द्रव्य होता है। छाल में टैनिन होता है। सूखे क्षीर में रवेदार पदार्थ आर्टोस्टेनोन (Artostenone C<sub>30</sub>H<sub>56</sub>O) पाया जाता है जिसका परिवर्तन आर्टोस्टेरोन (Artosterone) में किया गया है जिसमें पुंस्त्वजनक (Androgenic–अँड्रोजेनिक) गुण पर्याप्त मात्रा में होते हैं। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA