भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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पृष्ठ 763

७१२ भावप्रकाशनिघण्टुः **कलमी आम के संस्कृत नाम-**राजास्र, टङ्क, आम्रात, कामाह तथा राजपुत्रक ये सब हैं। **कलमी आम-**कषाय तथा मधुर रस युक्त, विशद गुण युक्त, शीतल, गुरु, ग्राही, रूक्ष एवम्-विबन्ध, आध्मान तथा वातकारक होता है और कफ तथा पित्त का नाशक होता है। [२१-२२] ३. कलमी आम सब प्रकार के कलमी आमों में लंगड़ा आम प्रसिद्ध है। हाजीपुर और बनारस का लंगड़ा आम सबसे अच्छा होता है, बम्बई का लंगड़ा मध्यम प्रकार का समझा जाता है। पूरब का गोला, लखनऊ का सफेदा, रामपुर का फजरी, मुरादाबाद का कलमी आदि आम अच्छे होते हैं। जिस आम में रेशा बहुत कम रहता है, गूदा अधिक रहता है तथा जो स्वाद में खूब मीठा सर्वप्रिय होता है उसी को उत्तम समझना चाहिये। यह जितना मीठा होता है उतने ही उसमें गुण भी अधिक होते हैं। आम में जो पुष्टिकारक, बलकारी, वीर्य को उत्पन्न करना इत्यादि गुण हैं वे सब भली प्रकार से पके हुए और मीठे ही आम में होते हैं। अन्य वर्णन आम के साथ लिखा गया है। अथ कोशाम्रः। तस्य नामानि तत्फलस्य च गुणाँश्चाह कोशाम्र उक्तः क्षुद्राम्रः कृमिवृक्षः सुकोशकः। कोशाम्रः कुष्ठशोथास्रपित्तव्रणकफापहः ।।२३।। तत्फलं ग्राहि वातघ्नमम्लोष्णं गुरु पित्तलम्। पक्वन्तु दीपनं रुच्यं लघूष्णं कफवातनुत् ।।२४।। **कोशाम्रः आम के संस्कृत नाम-**कोशाम्र, क्षुद्राम्र, कृमिवृक्ष तथा सुकोशक ये सब हैं। **कोशाम्र-**कुष्ठ, शोथ, रक्तविकार, पित्त या रक्तपित्त, व्रण और कफ का नाशक है। कोशाम्र आम का फल-ग्राही, वातनाशक, अम्लरसयुक्त, उष्ण, गुरु तथा पित्तजनक होता है। यदि इसके फल पके हों तो अग्निदीपक, रुचिकारक, लघु, उष्ण एवं कफ तथा वात के नाशक होते हैं। [२३-२४] ४. कोशाम्र **हिं०-**कोशाम्भ, कुसुम, कोसम। **क०-**चकोट। **म०-**कोसिंब। **ता०-**पुमरम्। **मल-**पुपम्। **गु०-**कोसुंव। **अं०-**Ceylon Oak (सिलोन् ओक्)। ले०-Schleichera trijuga Willd. (श्लीकेरा ट्राइज्यूगा)। Fam. Sapindaceae (सेपिन्डेसी)। यह सतलज से नेपाल तक, दक्षिण तथा सिवालिक पहाड़ के ऊपर मध्य भारत में पाया जाता है। इसका **वृक्ष-**बड़ा छायादार तथा सुन्दर होता है। **पत्ते-**पक्षवत् तथा ८-१६ इञ्च लम्बे होते हैं। **पत्रक-**२ से ४ जोड़े, अखण्ड, ३-१० इञ्च लम्बे, आयताकार, अवृन्त तथा चिकने होते हैं। नीचे वाले पत्रक ऊपर के पत्रकों की अपेक्षा छोटे होते हैं। **फूल-**मञ्जरी में आते हैं और वे पीलापन युक्त हरे रंग के होते हैं। **फल-**१ १/२ इञ्च लम्बे गोल, दानेदार और किञ्चित् नोकीले होते हैं। **बीज-**१ से ३, चिकने तथा लंबगोल चिपटे होते हैं। इस पर लगी हुई लाख बहुत उत्तम मानी जाती है। बीज की गुद्दी तथा बाह्यवृद्धि (Aril) खाई जाती है। इसकी **छाल-**मोटी, मुलायम, बाहर से धूसर, खुरदरी तथा भीतर से फीके लाल रंग की होती है। तोड़ने से भग्न छोटा होता है। स्वाद कुछ कषाय तथा गंध हलकी। इसकी छाल तथा बीज तैल का उपयोग किया जाता है। कलकत्ते की तरफ बीजों को पक कहते हैं। **रासायनिक संगठन-**बीजों में साइनोजेनेटिक ग्लूकोसाइड पाया जाता है। **गुण और प्रयोग-**इसकी छाल कषाय होती है तथा पानी में घिस कर खुजली आदि चर्मरोगों पर लगाई जाती है। बीजों का तेल, जिसे मकासर तेल कहते हैं, खुजली पर लगाया जाता है। इसको बालों में लगाने से बाल स्वच्छ होते हैं तथा बढ़ते हैं। बीजों का चूर्ण जानवरों के व्रणों पर डालते हैं जिससे कीड़े निकल जाते हैं।