भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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आम्रादिफलवर्गः ७११ गुण और प्रयोग-इसकी छाल उत्तम रक्तसंग्राहक है तथा इसका क्वाथ फुप्फुस, आंत्र एवं गर्भाशय से रक्तस्राव होने पर दिया जाता है। रक्तार्श तथा अत्यार्तव में मज्जा १० से १५ रत्ती की मात्रा में देते हैं। छिलके के साथ कच्चा फल पीस कर आमाशय एवं गले की शिथिलता तथा गले के अर्बुद में देते हैं। कच्चे फल का शरबत (पन्ना) लू लगने पर पिलाते हैं। गुठली के अन्दर की मज्जा अतिसार तथा प्रवाहिका में दी जाती है। मात्रा-मज्जा १० से १५ रत्ती; छाल ३-६ माशा। अथाम्रातकः (अम्बाडा)। तन्नामानि तत्पक्वापक्वफलगुणाँश्चाह आम्रातकः पीतनश्च मर्कटाम्रः कपीतनः। आम्रातमम्लं वातघ्नं गुरूष्णं रुचिकृत्सरम् ।।१९।। पक्वन्तु तुवरं स्वादु रसे पाके हिमं स्मृतम्। तर्पणं श्लेष्मलं स्निग्धं वृष्यं विष्टम्भि बृंहणम् ।। गुरु बल्यं मरुत्पित्तक्षतदाहक्षयास्रजित् ।।२०।। अम्बाडा के संस्कृत नाम-आम्रातक, पीतन, मर्कटाम्र, कपीतन और आम्रात ये सब हैं। अम्बाडा-अम्ल रस युक्त, वातनाशक, गुरु, उष्ण, रुचिकारक और सारक होता है। अम्बाडा का पकाफल-कषाय रस युक्त, स्वादिष्ट, विपाक में मधुर, शीतल, सन्तर्पण करने वाला, कफजनक, स्निग्ध, वृष्य, विष्टम्भक (वायु को स्तब्ध करने वाला), बृंहण, गुरु, बलकारक, एवम् वात, पित्त, क्षत, दाह, क्षय और रक्तविकार का नाशक है।।१९-२०] २. अम्बाडा हिं०-अम्बाडा अमड़ा, अमरा, आमड़ा। बं०-आमडा। म०-अंबाडा, ढोर आंबा। गु०-अंबेडा। क०- अंवर। ते०-अंबालमु। अं०-Indian Hog plum. (इण्डियन हॉग प्लम्)। ले०-Spondias mangifera Willd. (स्पॉण्डिएस् मॅङ्गीफेरा)। Fam. Anacardiaceae (अॅनेकार्डिएसी)। अम्बाडा का वृक्ष-बड़ा होता है। पत्ते-संयुक्त तथा १-१ १/२ फीट लम्बे होते हैं। पत्रक-३ से ६ इञ्च लम्बे, १ १/२-३ इञ्च चौड़े तथा चमकीले, दीर्घवृत्ताभ आयताकार, लम्बाग्र तथा किनारे के चारों ओर रहने वाली शिरा में अन्य शिराएँ मिलती हैं। पुष्प-हरिताभ, श्वेत वर्ण तथा छोटे होते हैं। वसन्त ऋतु में इसके सब पत्ते गिर जाते हैं और मञ्जरी लगती है। फल-गुच्छों में, हरिताभ एवं अंडाकार लगते हैं। इनका अचार बनाते हैं। यह देशी और विलायती भेद से दो प्रकार का होता है। विलायती को स्पौ० डलसिस् (S. dulcis) कहते हैं। देशी के फल कच्ची अवस्था में अम्ल किन्तु पकने पर बाहरी भाग में अम्ल तथा अंदर से मधुर होते हैं। विलायती के फल गहरे अंबर वर्ण के, अत्यन्त अम्ल एवं इसमें खराब आम के जैसी गंध आती है। सुखाये हुये अपक्व फलों का चिकित्सा में उपयोग किया जाता है। गुण और प्रयोग-यह ग्राही तथा रक्तपित्त शामक होते हैं। छाल अतिसार में देते हैं। कर्णशूल में पत्तों का रस डालते हैं। फल का रस पित्तप्रकोप में देते हैं। अथ राजाम्रः (कलमी आम)। तन्नामानि तत्फलस्य गुणाँश्चाह राजाम्रष्टङ्क आम्रातः कामाङ्गो राजपुत्रकः ।।२१।। राजाम्रं तुवरं स्वादु विशदं शीतलं गुरु। ग्राहि रूक्षं विबन्धाध्मावातकृत्कफपित्तनुत् ।।२२।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA