भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

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७१६ भावप्रकाशनिघण्टुः

अथ चिर्भिटम् (कचरिया, फूट)। तन्नामानि

पक्वापक्वतत्फलगुणाँश्चाह

चिर्भिटं धेनुदुग्धं च तथा गोरक्षकर्कटी ॥ ३६॥ चिर्भिटं मधुरं रूक्षं गुरु पित्तकफापहम् । अनुष्णं ग्राहि विष्टम्भि पक्वं तूष्णञ्च पित्तलम् ॥ ३७॥ कचरिया के संस्कृत नाम-चिर्भिट, धेनुदुग्ध तथा गोरक्षकर्कटी ये सब हैं। कचरिया-मधुर रसयुक्त, रूक्ष, गुरु, पित्त-कफहर, किंचित् उष्ण, ग्राही, विष्टम्भी (दस्त साफ न लाने वाली) होती है एवं पका फल-उष्ण तथा पित्तजनक होता है। [३६-३७]

८. फूट

हिं०-फूट, फूंट। बं०-फुटि । म०-फूट । ले०-Cucumis momordica Roxb. (क्युक्कुमिस् मोमोर्डिका) । Fam. Cucurbitaceae (कुकुरबिटेसी) । फूट-प्रायः सब प्रान्तों की रेतीली भूमि में उत्पन्न होता है और खेतों में इसको रोपण करते हैं। इसकी लता-होती है। पत्ते-गोलाकार, गहरे कटे किनारे वाले या प्रायः पांच भाग वाले तथा बारीक दन्तुर होते हैं। फूल-छोटे-छोटे होते हैं। फल-१ से २ फीट लम्बे, बेलनाकार, ३ से ६ इञ्च व्यास के, चिकने, कच्ची अवस्था में गहरे रंग के तथा पकने पर नीबू जैसे पीतवर्ण के होते हैं। इसके दो भेद होते हैं। एक वर्षा में होता है तथा दूसरा ग्रीष्म में। इसको कच्चा या पकाकर लोग खाते हैं। गुण और प्रयोग-इसके बीज दाहप्रशमन माने जाते हैं।

अथ नारिकेलः (नारियल)। तन्नामानि तत्फलसाधारणगुणाँश्चाह

नारिकेलो दृढफलो लाङ्गली कूर्चशीर्षकः । तुङ्गः स्कन्धफलश्चैव तृणराजः सदाफलः ।। ३८ ।। नारिकेलफलं शीतं दुर्जरं वस्तिशोधनम् । विष्टम्भि बृंहणं बल्यं वातपित्तास्रदाहनुत् ।। ३९ ।। नारियल के संस्कृत नाम-नारिकेल, दृढफल, लाङ्गली, कूर्चशीर्षक, तुङ्ग, स्कन्धफल, तृणराज तथा सदाफल ये सब हैं। नारियल का फल-शीतल, दुर्जर (देर में हजम होने वाला), वस्तिशोधक, विष्टम्भक, बृंहण (रस-रक्तादिवर्धक), बलकारक एवम्-वात, पित्त, रक्तविकार तथा दाह को दूर करने वाला होता है। [३८-३९]

अथ कोमलजीर्णतत्फलयोर्गुणानाह

विशेषतः कोमलनारिकेलं निहन्ति पित्तज्वरपित्तदोषान् । तदेव जीर्णं गुरु पित्तकारि विदाहि विष्टम्भि मतं भिषग्भिः ।। ४० ।। नारियल का कोमल फल-विशेषतः पित्तज्वर तथा पित्तदोष को दूर करने वाला होता है। पुराना फल-गुरु, पित्तकारक, विदाही तथा विष्टम्भक होता है ऐसा वैद्यों का मत है। [४०]

अथ नारिकेलजलगुणानाह

तस्याम्भः शीतलं हृद्यं दीपनं शुक्रलं लघु । पिपासापित्तजित्स्वादु वस्तिशुद्धिकरं परम् ।। ४१ ।। नारियल का जल-स्वादिष्ट, शीतल, हृदय को हितकर, अग्निदीपक, शुक्रजनक, लघु, अत्यन्त बस्तिशोधक एवम् प्यास तथा पित्त को शान्त करने वाला होता है। [४१] CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA