भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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७२८ भावप्रकाशनिघण्टुः (२) बीज मधुमेह के लिये उपयोगी समझे जाते हैं। कुत्तों में इसके जलीय सत्त्व के सूचिकाभरण से रक्तगत शर्करा का प्रमाण कम हो जाता है किन्तु मुख द्वारा प्रयोग से यह प्रभाव नहीं दिखलाई देता। (३) पत्तों का रस रक्तातिसार तथा अत्यार्त्तव में दिया जाता है। (४) पत्तों को पीसकर लोहचूर्ण में मिलाकर रखने से एक उत्तम प्रकार का लोह क्षार तैयार होता है जिसे पांडु तथा स्त्रियों के पांडु सहित अतिसार में देते हैं। (५) इसका सिरका तथा आसव दीपन, पाचन होता है तथा उसे मधुमेह, अतिसार आदि में देते हैं। मात्रा-बीजचूर्ण १ से ३ माशा; स्वरस १ से २ तोला। अथ जलजम्बुका (छोटी जामुन, नदी जामुन) । तस्या नामानि गुणांश्चाह क्षुद्रजम्बूः सूक्ष्मपत्रा नादेयी जलजम्बुका । जम्बूः संग्राहिणी रूक्षा कफपित्तास्रदाहजित् ।।७०।। छोटी जामुन के संस्कृत नाम-क्षुद्रजम्बू, सूक्ष्मपत्रा, नादेयी तथा जलजम्बुका ये सब हैं। छोटी जामुन-संग्राही, रूक्ष एवम्-कफ, पित्त, रक्तविकार तथा दाह को दूर करने वाली होती है। [७०] २१. छोटी जामुन हिं०-छोटी जामुन, कठ जामुन, वन जामुन। ले०-Eugenia heyneana Wall. (यूजेनिया हेनियाना)। Fam. Myrtaceae (मिटेंसी)। इसके छोटे-छोटे गुल्मवत् वृक्ष या गुल्म होते हैं। यह जामुन का ही भेद है। यह नदी नालों के किनारे अधिक होता है। अन्य भेदों का उल्लेख जामुन के साथ किया जा चुका है। अथ बदरी (बेर) । तस्या नामान्याह पुंसि स्त्रियाञ्च कर्कन्धूर्बदरी कोलमित्यपि ।।७१।। फेनिलं कुवलं घोण्टा सौवीरं बदरं महत् । अजप्रिया कुहा कोली विषमोभयकण्टका ।।७२।। छोटे बेर के संस्कृत नाम-कर्कन्धू (यह पुंल्लिङ्ग तथा स्त्रीलिङ्ग में होता है), बदरी, अजप्रिया कुहा, कोली, विषमा तथा उभयकण्टका ये सब हैं। बड़े बेर के संस्कृत नाम-फेनिल, कुवल, घोण्टा और सौवीर ये सब हैं। बड़े बेर से कुछ छोटा जो होता है उसे कोल कहते हैं। [७१-७२] तत्र बदरविशेषाणां लक्षणानि गुणांश्चाह पच्यमानं सुमधुरं सौवीरं बदरं महत्। सौवीरं बदरं शीतं भेदनं गुरु शुक्रलम् ।।७३।। बृंहणं पित्तदाहास्रक्षयतृष्णानिवारणम्। सौवीरं लघु सम्यक्वं मधुरं कोलमुच्यते ।।७४।। कोलन्तु बदरं ग्राहि रुच्यमुष्णाञ्च वातहृत्। कफपित्तकरं चापि गुरु सारकमीरितम् ।।७५।। कर्कन्धूः क्षुद्रबदरं कथितं पूर्वसूरिभिः। अम्लं स्यात्क्षुद्रबदरं कषायं मधुरं मनाक् ।।७६।। स्निग्धं गुरु च तिक्तञ्च वातपित्तापहं स्मृतम्। शुष्कं भेद्यग्निकृत्सर्वं लघु तृष्णाक्लमस्रजित् ।।७७।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA