भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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आम्रादिफलवर्गः ७२७ कभी एक घंटे बाद भी होते हैं किन्तु एकाएक तीव्र रूप में। बाद में स्फुरण, कंप तथा धनुर्वात जैसे आक्षेप आने लगते हैं। मृत्यु श्वासावरोध से होती है। चिकित्सा में प्रथम वमन कराना, जिसके लिये अर्कमूलत्वचा, मैनफल, जिंक सल्फेट का उपयोग या नलिका द्वारा आमाशय-प्रक्षालन कराना चाहिये। फिर दूध में गाय का घी या अंडे की सफेदी, या शोधित कोयला का चूर्ण या पोटैशियम् परमैग्नेट आदि द्रव्य खिलाना चाहिये। पेशियों को शिथिल करने वाले द्रव्य जैसे अफीम, बेलाडोना, कपूर, गाँजा, तंबाकू आदि का उपयोग मुख द्वारा या सूचिकाभरण से करना चाहिये। इसके लिये क्लोरोफार्म या ईथर सुँघाना ज्यादा अच्छा है। बारबिटोन श्रेणी की औषधियों का शिरा द्वारा सूचिकाभरण शिथिलता तथा नींद लाने के लिये अच्छा है। इसकी साधारण घातक मात्रा, बीजों की ११.५५ से ४६.३८ ग्रेन तथा स्ट्रिकनीन की १.५४ ग्रेन है। इससे कम से भी मृत्यु हुई है तथा इससे बहुत अधिक मात्रा के सेवन के पश्चात् भी चिकित्सा से रोगी बचाये गये हैं। मात्रा-१ से ४ ग्रेन (१/२-२ रत्ती)। अथ राजजम्बू (बड़ी जामुन) । तन्नामानि तत्फलगुणाँश्चाह फलेन्द्रा कथिता नन्दी राजजम्बूर्महाफला । तथा सुरभिपत्रा च महाजम्बूराप स्मृता । राजजम्बूफलं स्वादु विष्टम्भि गुरु रोचनम् ।।६९।। बड़ी जामुन के संस्कृत नाम-फलेन्द्रा, नंदी, राजजम्बू, महाफला, सुरभिपत्रा और महाजम्बू ये सब हैं। बड़ी जामुन का फल-स्वादिष्ट, विष्टम्भक, गुरु तथा रोचक होता है। [६९] २०. बड़ीजामुन हिं०-बड़ी जामुन, फरेन्द्र (न), फड़ेना, फलेन्द्रा, राजजामुन। बं०-बड़जाम, कालजाम। म०-जाम्भूल। गु०-जाम्बुन। क०-दोड्डुनिरलु, दोदुनिरली (लु)। ते०-पेद्देनरेर्डि, नेरडुं चेट्टु। ता०-नागै, सम्बल। अं०- Jambul Tree (जाम्बुल ट्री)। ले०-Eugenia jambolana Lam. (युजेनिया जम्बोलेना)। Syzygium cumini Skeels (सिझिजियम क्यूमिनाइ)। Fam. Myrtaceae (मिर्र्टेसी)। यह अत्यन्त शुष्क भागों को छोड़कर सब प्रान्तों में पायी जाती है। इसका वृक्ष-बड़ा होता है और वह सदा हरा- भरा रहता है। पत्ते-विपरीत, दीर्घवृत्ताकार, दीर्घवृत्ताकार भालाकार, अंडाकार या आयताकार, लम्बाग्र या कुण्ठिताग्र, चिकने, चमकीले, ३ से ६ इञ्च लम्बे तथा १/२ से १ इञ्च लम्बेवृन्त से युक्त होते हैं। फूलों की मञ्जरियाँ किञ्चित् हरापन युक्त सफेद होती हैं और उससे सुगन्ध आती है। फल-आध से डेढ़ इञ्च तक लम्बे, गोल, पकने पर बैंगनी युक्त काले रंग के हो जाते हैं। उसमें गुदी होती है। जाति-जामुन की कई जातियाँ होती हैं। भावप्रकाश में आगे जलजम्बू का उल्लेख किया गया है। इसके अतिरिक्त क्षुद्रजम्बू, काकजम्बू, भूमिजम्बू (E. operculata), गुलाबजामुन (E. jambos) आदि भेद पाये जाते हैं। राजजम्बू का वर्णन ऊपर किया गया है जो सबमें श्रेष्ठ है। जलजम्बू या क्षुद्रजम्बू का आगे वर्णन किया गया है। जामुन के फल, मज्जा, छाल तथा पत्तों का उपयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन-बीजों में एल्लेजिक् ॲसिड (Ellagic acid), सुगन्धित्तैल, स्थिरतैल तथा राल होती है। गुण और प्रयोग-जामुन वातजनक, कफपित्तशामक, ग्राही, मूत्रसंग्रहणीय तथा पत्ते वमनरोधक हैं। (१) इसकी छाल कषाय एवं स्तंभन होने के कारण इसके क्वाथ का उपयोग गण्डूष तथा व्रण प्रक्षालन के लिये तथा अतिसार आदि में करते हैं। इसका ताजा रस बकरी के दूध में मिलाकर बच्चों के अतिसार में देते हैं।