भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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७२६ भावप्रकाशनिघण्टुः यह गोरखपुर, बिहार, उड़ीसा तथा विशेष रूप से दक्षिण में पाया जाता है। इसका वृक्ष-बड़ा होता है एवं किसी-किसी में काँटे भी होते हैं। स्तम्भ-मोटा और सीधा रहता है। पत्ते- ३ से ६ इञ्च तक लम्बे, १ ३/४-३ इञ्च चौड़े, दीर्घवृत्ताकार, चिकने चमकीले तथा ५ शिराओं से युक्त जिनमें पार्श्व की शिराएँ अस्पष्ट रहती हैं। फूल-छोटे-छोटे हरापन युक्त सफेद आते हैं। फूला हुआ वृक्ष बहुत सुहावना दिखाई पड़ता है। फल-गोल, चिकने, नारङ्गी के बराबर १ से ३ इञ्च व्यास में और उसी रंग में आते हैं। इसके भीतर एक प्रकार का कड़वा सफेदकोमल पदार्थ (गूदी) भरा रहता है जिसमें अनेक बीज रहते हैं। बीज-३/४ इञ्च के घेरे में, चिपटे, गोल, एक तरफ से उन्नतोदर तथा दूसरी तरफ से नतोदर और चमकीले सफेद मखमली रेशों से भरे रहते हैं। इसके बीज, छाल, पत्ते, काष्ठ आदि का उपयोग किया जाता है। बीजों का ही अधिक उपयोग होता है। शोधन-बीजों को शोधन करके व्यवहार करना चाहिये। सात दिन गोमूत्र में रखकर छिलके निकाल कर, गोदुग्ध में उबाले। फिर गाय के घी में भून कर चूर्ण बना प्रयोग करें। रासायनिक संगठन-इसके समस्त भागों में प्रधान रूप से स्ट्रिकनीन् Strychnine) तथा ब्रूसीन (Brucine) एवं अल्प अन्य क्षाराभ पाये जाते हैं। छाल में ब्रूसीन ही अधिक होता है। बीज में १.५३-३.४२% क्षाराभ होता है जिसमें करीब आधा स्ट्रिकनीन होता है। बीजों में एक ग्लूकोसाइड, लोगैनिन् (Loganin) एवं अत्यल्प ताम्र पाया जाता है। अन्य जाति के बीजों की मिलावट से इसके क्षाराभों की मात्रा में कमी हो जाती है अन्यथा बीजों को रखने से इसमें परिवर्तन नहीं होता। गुण और प्रयोग-यह कटु, तिक्त, उष्ण, दीपन, पाचन, उत्तेजक, बल्य एवं बाजीकर है। इसका उपयोग, पाचन के विकार, वातरोग तथा हृदय की दुर्बलता में किया जाता है। यह केन्द्रीय वातनाड़ी संस्थान, विशेष कर सुषुम्ना तथा प्रेरक केन्द्रों को उत्तेजित करता है। (१) इसका चूर्ण देने से भूख बढ़ती है तथा पाचक रसों की वृद्धि होती है। इसके टिंचर से आंत्र की गति बढ़ती है इसलिये इसे जीर्ण विबंध में अन्य मृदुविरेचन औषधियों के साथ देते हैं। कुपचन, शूल आदि विकारों में इससे लाभ होता है। (२) वातिक संस्थान के लिए उत्तेजक होने के कारण अनेक वातविकारों जैसे अर्दित, अर्धांग, गतिभ्रंश, ज्ञानभ्रंश, पेशीशोष, कंप, नाड़ीशूल, बाधिर्य, घटसर्प से उत्पन्न या अधिक बोलने से उत्पन्न आवाज न निकलना एवं तंबाकू के अधिक सेवन से उत्पन्न आन्ध्य आदि में इससे लाभ होता है। (३) बच्चों के शय्यामूत्र, हस्तमैथुन या अतिमैथुन से उत्पन्न नपुंसकता में इसे देते हैं। वार्धक्य में बाजीकरण के लिये कुचला, लोह तथा काली मिरिच देते हैं। (४) हृदय तथा श्वसन-संस्थान की दुर्बलता में इसके देने से उन-उन अंगों को बल मिलता है। इसके साथ अन्य औषधियों को देना पड़ता है। (५) इसके जड़ की छाल को नींबू के रस में घोंटकर बनाई गोली विसूचिका में दी जाती है। कृमियुक्त व्रण में पत्तों का पुल्टिस लगाया जाता है। गाय को पत्ते खिलाने से दूध में कडुवाहट आती है तथा वह अधिक सुपाच्य या पाच्य माना जाता है। कुछ पक्षी, जानवर इसके फल को खाते हैं। जानवरों को मारने के लिये भी इसका उपयोग करते हैं। विषलक्षण एवं चिकित्सा-इसको अधिक मात्रा में देने से मृत्यु हो सकती है इसलिये इसका प्रयोग सावधानी से करना चाहिये। प्रारम्भ में इससे बेचैनी, घबड़ाहट, प्रतिवर्तों (Reflex) का बढ़ना, पेशीस्फुरण, गले एवं चलने में भारीपन एवं एकाएक किसी अंग में विक्षेप आदि लक्षण होते हैं। ये लक्षण १५ से २० मिनट में प्रारम्भ होते हैं। कभी- CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmụ. Digitized by S3 Foundation USA