भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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आम्रादिफलवर्गः ७२५ १८. तेंदू हिं०-तेंदू, गाव, गाभ। बं०-गाव। म०-टेंबुरणी। गु०-टींबरू। ते०-तुमिवि। ता०-तुम्बिक। अं०- Gaub Persimon (गाँब पर्सिमॉन)। ले०-Diospyros embryopteris Pers. (डायोस्पाइरॉस एम्ब्रीओप्टेरिस)। Fam. Ebenaceae (एबेनेसी)। यह प्रायः सब प्रान्तों में पाया जाता है। विशेष कर बंगाल में अधिक होता है। इसका वृक्ष-मध्यमाकार का, शाखा-प्रशाखा करके सघन और बारहोमास हरा-भरा रहता है। छाल-भूरे रंग की होती है। पत्ते-२ इञ्च चौड़े, ५-९ इञ्च तक लम्बे, किंचित् अण्डाकार, आयताकार, चिकने, चर्मसदृश और चमकीले होते हैं। फूल-सफेद, पत्रदण्ड के पास झुमकों में आते हैं। फल-२-३ इञ्च के घेरे में गोलाकार और पकने पर कुछ पीले रंग के हो जाते हैं। ये रक्तकट्टावरण से ढके रहते हैं। इसके भीतर लसीली गूदी होती है। मल्लाह लोग सन के साथ इसकी गूदी को मिला कर नाव के छेदों को बन्द करते हैं। बीज-४ से ८ रहते हैं। इसको बंदर बहुत खाते हैं। इस आधा पर इसे 'मर्कटतिन्दुक' एवं इसकी अन्य जाति डॉ० मेलॅनोक्जाइलोन (D. melanoxylon, Roxb.) को तिन्दुक श्री ठा० बलवन्तसिंह जी ने माना है। रासायनिक संगठन-इसके बीजों में तेल होता है। छाल तथा फल में टैनिन होता है। फलों में पेक्टिन बहुत होता है। इसके ईथरीय सत्त्व में, ईस्चेरिचिया कोलाई (Escherichia coli) जीवाणुनाशक शक्ति होती है। गुण और प्रयोग-इसकी गुदी अच्छी संग्राहक होती है। इसको जीर्ण अतिसार तथा प्रवाहिका में देते हैं। बीजों का तेल भी अतिसारादि में दिया जाता है। विषम ज्वर में छाल देते हैं। मुखपाक में फल के फांट से कुल्ला कराते हैं तथा व्रण एवं क्षत पर स्वरस लगाते हैं। मात्रा-शुष्क गुद्दी १ से ५ रत्ती। अथ कुपीलुः । यस्य फलं कुचिला इति लोके 'मकरतेंदुआ' इति च। तन्नामानि तत्फलगुणाँश्चाह तिन्दुको यस्तु कथितो जलदो दीर्घपत्रकः ।। ६६ ।। कुपीलुः कुलकः काकतिन्दुकः काकपीलुकः । काकेन्दुर्व्विषतिन्दुश्च तथा मर्कटतिन्दुकः ।। ६७ ।। कुपीलुः शीतलं तिक्तं वातलं मदकृल्लघु । परं व्यथाहरं ग्राहि कफपित्तास्रनाशनम् ।। ६८ ।। कुपीलु (जिसके फल को लोक में 'कुचिला' कहते हैं तथा जो 'मकरतेंदुआ' भी कहलाता है) के संस्कृत नाम- तिन्दुक, जलद, दीर्घपत्रक, कुपीलु, कुलक, काकतिन्दुक, काकपीलुक, काकेन्दु, विषतिन्दु तथा मर्कटतिन्दुक ये सब हैं। कुचिला-तिक्तरसयुक्त, शीतल, वातजनक, मदकारक, लघु, अत्यन्त व्यथा को दूर करने वाला, ग्राही एवं- कफ, पित्त तथा रक्तविकार को दूर करने वाला होता है। [६६-६८] १९. कुचला हिं०-कुचला, कुचिला। बं०-कुँचिला। म०-काजरा। गु०-झेर कोंचला। क०-कंजि, हेमुष्टि, कासर। ते०-मुसिडे। ता०-एट्टेमारं, काकोठीं। फा०-कुचूला, फुलूसंमाही, इजराकी। अ०-हब्बुलगुराब, अजराकि, खानेकऊल् केल्ला। अं०-Poison-nut tree (पॉइजन नट ट्री); Nux-vomica tree (नक्स-वोमिका ट्री)। ले०-Strychnos nux-vomica Linn. (स्ट्रिक्नॉंस नक्स वोमिका)। Loganiaceae (लोगेनिएसी)।

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