भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७२४ भावप्रकाशनिघण्टुः (१) इसका फल रक्तपित्त, अतिसार तथा प्रवाहिका में दिया जाता है। इसके गोंद से उदर की मरोड़ कम होती है। (२) बच्चों के अजीर्ण में पत्तों का उपयोग करते हैं। अथ नारङ्गः (नारङ्गी)। तन्नामानि मधुराम्लनारङ्गयोर्गुणांश्चाह नारङ्गो नागरङ्गः स्यात्त्वक्सुगन्धो मुखप्रियः ।। ६३ ।। नारङ्गो मधुराम्लः स्याद्रोचनो वातनाशनः। अपरं त्वम्लमत्युष्णं दुर्जरं वातहृत् सरम् ।। ६४ ।। नारङ्गी के संस्कृत नाम—नारङ्ग, नागरङ्ग, त्वक्सुगन्ध तथा मुखप्रिय ये सब हैं। नारङ्गी—मधुर तथा अम्लरसयुक्त, रोचक एवम् वातनाशक होती है और दूसरी जाति की नारङ्गी अम्लरसयुक्त, अत्यन्त उष्ण, देर में हजम होने वाली, सारक तथा वातनाशक होती है। [६३-६४] १७. नारङ्गी हिं०—नारङ्गी, संतरा, संत्रा। बं०—कमलानेबु। म०—नारिंग, संत्रा गु०—नारङ्गी। फा०—किस्मे अज नारंज, नारंज। अ०—नारंज। अं०—Orange (ऑरेंज)। ले०—Citrus reticulata Blanco (साइट्रस रेटिक्युलेटा)। Fam. Rutaceae (रूटेंसी)। यह सब प्रान्तों की वाटिकाओं में रोपण किया जाता है। आसाम, सिक्किम, मध्य भारत, पंजाब तथा कुर्ग में इसकी अधिक खेती की जाती है। इसका वृक्ष—छोटा होता है। पत्ते—चिकने ४-५ इञ्च लम्बे नींबू के पत्ते के आकार वाले होते हैं। पर्णवृन्त करीब- करीब पक्षहीन होता है। फूल—सफेद रंग के आते हैं और उनसे सुगन्ध आती है। फल—२ इञ्च के घेरे में गोलाकार और दोनों ओर दबे हुए होते हैं, पकने पर वे नारङ्गी रंग के हो जाते हैं। इसकी एक अन्य जाति होती है जिसमें फल बहुत खट्टा होता है उसे सा० ऑरेंन्शिअम् लिन. (C. aurantium Linn.) कहते हैं। इसका चिकित्सा की दृष्टि से यह महत्त्व है कि इसमें विटामिन ‘ए’ का पूर्वरूप एवं विटामिन बी बहुत होता है तथा इसके छिलके कुछ दीपन एवं सुगंधि के लिये काम में आते हैं। संतरे के स्थान, स्वरूप आदि भेद से अनेक भेद पाये जाते हैं। रासायनिक संगठन—छिलके में एक तेल होता है जिसमें लिमोनेन (Limonene) बहुत होता है। इसकी शाखा तथा पत्तों से पेटिट्ग्रेन आईल (Petitgrain oil) प्राप्त किया जाता है। फल में विटामिन ‘सी’, ‘बी’, ‘ए’ एवं खनिज द्रव्य, शर्करा, अम्ल द्रव्य एवं पेक्टिन आदि द्रव्य होते हैं। गुण और प्रयोग—इसका रस ज्वरहर, तृषाशामक, दुर्जर, हृद्य, रुचिकारक एवं वातघ्न है। अथ तिन्दुकः (तेंन्दू)। तन्नामानि पक्वापक्वतत्फलगुणांश्चाह तिन्दुकः स्फूर्जकः कालस्कन्धश्चासितकारकः। स्यादामं तिन्दुकं ग्राहि वातलं शीतलं लघु ।। पक्वं पित्तप्रमेहास्रश्लेष्मघ्नं मधुरं गुरु ।। ६५ ।। तेंदू के संस्कृत नाम—तिन्दुक, स्फूर्जक, कालस्कन्ध तथा असितकारक ये सब हैं। तेंदू का कच्चा फल—ग्राही, वातजनक, शीतल एवम् लघु होता है। पकाफल—मधुर रसयुक्त, गुरु एवम्—पित्त, प्रमेह, रक्तविकार तथा कफ का नाशक होता है।