भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

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आम्रादिफलवर्गः ७२३ पके फल की अपेक्षा बेल के कच्चे फल के गुणाधिक्य का वर्णन—सामान्य रूप से फलों में पका फल ही अधिक गुणकारी कहा गया है किन्तु यह नियम बेल के फल के लिये नहीं है ऐसा समझना चाहिये, क्योंकि बेल का कच्चा फल ही विशेष गुणकारी होता है । एवम्-द्राक्षा (दाख), बेल तथा हरड़ आदि के फल यदि सूखे हों तो अधिक गुणकारी होते हैं। [५९-६०] १५. बेल का फल नोट—बेल के सम्बन्ध में अन्य वर्णन गुडूच्यादिवर्ग में पृ० २७४-२७६ किया जा चुका है। अथ कपित्थः (कैथ) । तन्नामानि तत्पक्वापक्वफलगुणाँश्चाह कपित्थस्तु दधित्थः स्यात्तथा पुष्पफलः स्मृतः । कपिप्रियो दधिफलस्तथा दन्तशठोऽपि च ।। ६१ ।। कपित्थमामं संग्राहि कषायं लघु लेखनम् । पक्वं गुरु तृषाहिक्काशमनं वातपित्तजित् ।। स्वादम्लं तुवरं कण्ठशोधनं ग्राहि दुर्जरम् ।। ६२ ।। कैथ के संस्कृत नाम—कपित्थ, दधित्थ, पुष्पफल, कपिप्रिय, दधिफल तथा दन्तशठ ये सब हैं। कैथ का कच्चा फल—कषाय रसयुक्त, संग्राही, लघु तथा लेखन होता है। पका फल—अम्ल तथा कषाय रसयुक्त, गुरु, कण्ठ को साफ करने वाला, ग्राही, देर में हजम होने वाला एवम्—प्यास तथा हिक्का को शमन करने वाला और वात तथा पित्त को दूर करने वाला होता है। [६१-६२] १६. कैंथ हिं०—कै(कें)थ, कैथा, कैंत, कईंत । बं०—कयेद्, कयेत् बेल । म०—कंवठ । गु०—कोठ । क०—वेललु । ते०—वेलग । ता०—बलामरं । अं०—Wood Apple (उड अॅपल), Elephant Apple (एलिफेण्ट अॅपल) । ले०—Feronia elephantum Correa (फेरोनिया एलिफॅन्टम्) । Fam. Rutaceae (रूटेसी) । यह इस देश के प्रायः सूखे प्रान्तों में अधिक उत्पन्न होता है तथा दक्षिण में वन्य अवस्थाओं में पाया जाता है । इसका वृक्ष—बहुत बड़ा होता है और उस पर सीधे काँटे होते हैं । वृक्ष से बबूर के गोंद के समान एक प्रकार का गोंद निकलता है । पत्ते—संयुक्त, सदलपर्ण, ३ से ४ इञ्च लम्बे होते हैं । पत्रक-अंडाकार या अभिअंडाकार, छोटे-छोटे, एक-एक सींक पर तीन-तीन अथवा ५ या ७-७ रहते हैं । फूल—फीके लाल रंग के होते हैं । फल—२-३ इञ्च के घेरे में गोल होते हैं और छिलका कठोर होता है । भीतर सुगंधित, स्वादु, खाने लायक गूदी होती है और गूदी में छोटे- छोटे अनेक चिपटे बीज होते हैं । इसमें एक आश्चर्यजनक गुण यह है कि यदि हाथी कैंत के फल को खाजावे तो इसका गूदा हाथी के पेट में रह जाता है और गूदा रहित अखंडित फल मल के साथ बाहर निकल आता है । इसके दो भेद होते हैं । एक में फल छोटे तथा अम्ल होते हैं । तथा दूसरे में फल बड़े तथा मीठे होते हैं । पक्व फल को चीनी के साथ या शरबत बनाकर या चटनी के रूप में खाया जाता है । इसकी जेली भी बनाई जाती है । इसके पत्र, गोंद तथा फल का उपयोग किया जाता है । रासायनिक संगठन—फल में खनिज तव विशेषकर खटिक, फॉस्फोरस तथा लोह अधिक होते हैं । इसके अतिरिक्त राइबोफ्लेविन (Riboflavine) तथा विटामिन 'सी' एवं पेक्टिन (Pectin 3 to 5%) होता है । इसके पत्तों में उड़नशील तैल ०.७३% होता है जिसमें मुख्य भाग एस्ट्रेंगॉल (Estragol, C₁₀ H₁₂ O) का होता है । गुण और प्रयोग—इसका फल—गुणों में बेल की तरह होता है । यह विशेष रूप से रक्तपित्तशामक होता है । पत्ते वातानुलोमक होते हैं । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA