भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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पृष्ठ 773

७२२ भावप्रकाशनिघण्टुः ताड़ का वृक्ष- १०० फीट तक ऊँचा होता है और उसके स्तम्भ की गोलाई ३ १/२-७ फीट तक होती है। स्तम्भ के सिरे पर ३ से ५ फीट के घेरे में ३०-४० पत्ते एक साथ सटे हुये गोलाकार और कटे हुए किनारेदार होते हैं। पत्रदंड- ३ से ४ फीट का होता है। यह पुरुष और स्त्री जाति के भेद से दो प्रकार का होता है। स्त्री जाति पर नारियल के फल के समान फल लगते हैं और पुरुष जाति पर बाल आते हैं। पुंपुष्पव्यूह का गलती से गजपिप्पली के स्थान पर प्रयोग किया जाता है। फल बड़े तथा रेशेदार होते हैं जिनके भीतर तीन खण्ड होते हैं जिनमें से प्रत्येक में बीज होता है इसके पुष्पित अक्ष को चीरा लगाने से रस प्राप्त होता है जिसे ताजे अवस्था में नीरा तथा बाद में ताड़ी कहते हैं इसको पकाकर गुड़ तथा मिश्री प्राप्त की जाती है। रासायनिक संगठन- नीरा में शर्करा तथा यीस्ट (Yeast) रहता है। यीस्ट से विटामिन बी प्राप्त होता है। पुंजाति से प्राप्त नीरा में शर्करा कुछ अधिक होती है। नीरा को रखने से स्वतः संधान प्रारम्भ हो जाता है तथा ६ से ८ घंटे के अन्दर इसमें ३% तक मद्यसार एवं ०.१% अम्ल तैयार हो जाता है। बाद में मद्यसार की मात्रा ५% तक बढ़ कर रुक जाती है। तत्पश्चात् अम्ल की वृद्धि होकर सिरका बन जाता है। गुण और प्रयोग-इसका फल मधुर, शीत, बल्य, बृंहण तथा पित्तहर है। बीज मूत्रल तथा वातपित्तशामक है। इसके नूतन पुष्पित भाग की राख अम्लतानाशक एवं विषमज्वरहर होती है। इसका उपयोग अम्लपित्त में तथा विषमज्वर में विशेषकर यकृत प्लीहावृद्धि होने पर करते हैं तथा चावल का मांड के साथ लेप भी करते हैं। इससे त्वचा लाल होकर फोड़े आते हैं। जीरा उत्तेजक, कफनाशक एवं मूत्रल होती है तथा इसे आल्हाद कारक पेय के रूप में पीते हैं। तालमिश्री कास, वक्ष के विकार तथा बालकों के लिये सारक रूप में प्रयोग में आती है। अथ बिल्वः (बेल) । तन्नामानि तद्बालफलनामगुणाँश्चाह बिल्वः शाण्डिल्यशैलूषौ मालूरश्रीफलावपि। बालं बिल्वफलं बिल्वकर्कटी बिल्वपेशिका ।। ग्राहिणी कफवातामशूलघ्नी बिल्वपेशिका ।।५६।। बेल के संस्कृत नाम-बिल्व, शाण्डिल्य, शैलूष, मालूर तथा ओफल ये सब हैं। बेल के कच्चे फल के संस्कृत नामा—बालबिल्वफल, बिल्वकर्कटी तथा बिल्वपेशिका ये सब हैं। बेल के कच्चे फल-ग्राही एवम् कफ, वात, आम तथा शूल को नष्ट करने वाले होते हैं। [५६] अन्यच्च बालं बिल्वफलं ग्राहि दीपनं पाचनं कटु । कषायोष्णं लघु स्निग्धं तिक्तं वातकफापहम् ।।५७।। ग्रन्थान्तर में कहे हुये कच्चे बेल के फल के गुण-यह ग्राही, अग्निदीपक, पाचक, कटु-तिक्त तथा कषाय रसयुक्त, उष्ण, लघु, स्निग्ध एवम् वात तथा कफ को दूर करने वाले होते हैं। [५७] अथ पक्वफलगुणानाह पक्वं गुरु त्रिदोषं स्याद् दुर्जरं पूतिमारुतम्। विदाहि विष्टम्भकरं मधुरं वह्निमान्द्यकृत् ।।५८।। बेल का पका फल-मधुर रसयुक्त, गुरु, त्रिदोषजनक, देर में हजम होने वाला, दुर्गन्धयुक्त अधोवायु को करने वाला, विदाही, विष्टम्भ तथा अग्निमान्द्यता को उत्पन्न करने वाला होता है। [५८] अथ पक्वापेक्षया बालस्य बिल्वफलस्य गुणाधिक्यमाह फलेषु परिपक्वं यद् गुणवत्तदुदाहृतम् ।।५९।। बिल्वादन्यत्र विज्ञेयमामं तद्धि गुणाधिकम्। द्राक्षाबिल्वशिवाऽऽदीनां फलं शुष्कं गुणाधिकम् ।।६०।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA

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