भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

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आम्रादिफलवर्गः ७२१ रासायनिक संगठन-साधारण सुपारी में टैनिन २१ से ३०% किन्तु चिकनी सुपारी में ९ से १५% रहता है। इसमें खटिक फॉस्फोरस, लौह तथा अनेक क्षाराभ जिनमें से मुख्य ॲरेकोलिन (Arecoline, C₆ H₁₁ O₂ N, 0.1%) है, पाये जाते हैं। यह क्षाराभ वात नाड़ी संस्थान के लिये विषैला है जिससे आक्षेप तथा अंगघात होता है। इसकी क्रिया पाइलोकार्पिन (Pilocarpine) की तरह होती है। इसके लवण के इन्जेक्शन घोड़ों के पेट फूलकर पीड़ा होने में देते हैं जिससे विरेचन होता है। जानवरों के चिपटे कृमि में भी इसे देते हैं। मनुष्यों में इसका उपयोग नहीं करते हैं। इसमें एक लाल रंग पाया जाता है जो क्षारीय खौलते जल में घुलता है तथा अम्ल से प्रक्षेपित हो जाता है। छोगारू का कत्थे जैसा उपयोग भी किया जाता है। गुण और प्रयोग-यह शीत रूक्ष, कषाय, मुखशुद्धिकर, वृष्य एवं कृमिघ्न होती है। ताजी मादक एवं कभी- कभी चक्कर लाने वाली होती है। इसे वातनाड़ियों के लिये बल्य तथा आर्तवप्रवर्तक भी मानते हैं। इसको चबाने से कुछ उत्तेजना आती है तथा मन प्रसन्न होता है। इसका उपयोग अतिसार, कृमि तथा मूत्रविकार आदि में करते हैं। इसको जलाकर मंजन भी बनाते हैं। (१) चिपटे कृमि के लिये एक कच्ची सुपारी दूध में पीस कर पिलाते हैं। (२) रक्तमिश्रित आँव में १/४-१/२ सुपारी का चूर्ण दिया जाता है। विष प्रभाव-अधिक मात्रा में यह विषैली होने के कारण केवल जानवरों के कृमि में ही इसका उपयोग अब किया जाता है। हमेशा चबाने से कैन्सर होने की सम्भावना व्यक्त की गई है। अथ तालः (ताड़)। तन्नामानि तत्पक्वफलमज्जगुणाँश्चाह तालस्तु लेख्यपत्रः स्यात्तृणराजो महोन्नतः ॥५२॥ पक्वं तालफलं पित्तरक्तश्लेष्मविवर्द्धनम्। दुर्जरं बहुमूत्रञ्च तन्द्राऽभिष्यन्दशुक्रदम् ॥५३॥ तालमज्जा तु तरुणः किञ्चिन्मदकरो लघुः। श्लेष्मलो वातपित्तघ्नः सस्नेहो मधुरः सरः ॥५४॥ ताड़ के संस्कृत नाम-ताल, लेख्यपत्र, तृणराज तथा महोन्नत ये सब हैं। पका ताड़ का फल-पित्त, रक्त तथा कफ की वृद्धि करनेवाला, देर में हजम होनेवाला, मूत्र की अत्यन्त प्रवृत्ति करने वाला एवम्-तन्द्रा, अभिष्यन्द तथा शुक्र को उत्पन्न करनेवाला होता है। ताड़ की मींगी जो कि खूब तैयार हो गई हो वह किञ्चित् मदकारक, लघु, कफजनक, स्नेहयुक्त, मधुर, सारक एवं-वात तथा पित्त का नाशक होती है। [५२-५४] अथ तालरसः (ताड़ी)। नवीनस्य प्राचीनस्य च नामानि गुणाँश्चाह तालजं तरुणं तोयमतीव मदकृन्मतम्। अम्लीभूतं तदा तु स्यात्पित्तकृद्वातदोषहृत् ॥५५॥ ताड़ का ताजाजल (ताड़ी)-अत्यन्त मदकारक होता है। यदि वही पुराना होने से खट्टा हो गया हो तो पित्तकारक एवं-वात दोष को दूर करने वाला होता है। [५५] ९४. ताड़ हिं०-ताड़, ताल, तार। बं०-ताल। म०-ताड़। ता०-पनै मरम। क०-तालिमारा। ते०-ताति। गु०- तड़। फा०-ताल। अ०-तार। अं०-The Palmyra Palm (दी पामीरा पाम्)। ले०-Borassus flabellifer Linn. (बोरेसस् फ्लेबेलिफेर)। Fam. Palmae (पामी)। यह प्रायः सभी स्थानों पर विशेषकर शुष्क प्रदेशों में, पेनिनसुला के तटीय प्रदेशों, बंगाल तथा बिहार में होता है। ४९ भाव.I CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA