भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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७२० भावप्रकाशनिघण्टुः रासायनिक संगठन-इसके फलों में खटिक, फास्फोरस, लौह, विटामिन सी तथा विटामिन बी₁ पाया जाता है। बीजों में तैल होता है। बीजों की राख में फॉस्फेट अधिक (P₂ O₅, 0.62%) रहते हैं। गुण और प्रयोग-यह शोथहर है। शोथ पर, इसको काटकर उसमें नमक डालकर बांधने से सूजन कम होती है तथा पूय एक स्थान पर इकट्ठा हो जाता है। बीज का उपयोग बस्तिशूल में करते हैं। अथ गुवाकः (सुपारी) । तन्नामानि तत्फलनामगुणाँश्चाह घोरण्टः पूगी पूगश्च गुवाकः क्रमुकोऽस्य तु। फलं पूगीफलं प्रोक्तमुद्वेगं च तदीरितम् ।।४९।। पूगं गुरु हिमं रूक्षं कषायं कफपित्तजित्। मोहनं दीपनं रुच्यमास्यवैरस्यनाशनम् ।।५०।। सुपारी के संस्कृत नाम-घोरण्ट, पूगी, पूग, गुवाक तथा क्रमुक ये सब हैं। इसके फल के संस्कृत नाम-पूगीफल तथा उद्वेग हैं। सुपारी-कषाय रसयुक्त, गुरु, शीतल, रूक्ष, मोहजनक, अग्निदीपक, रोचक एवम्-कफ, पित्त तथा मुख की विरसता को दूर करने वाली होती है। [४९-५०] अथार्द्रस्विन्नतफलगुणानाह आर्द्रं तद् गुर्वभिष्यन्दि वह्निदृष्टिहरं स्मृतम्। स्विन्नं दोषत्रयच्छेदि दृढमध्यं तदुत्तमम् ।।५१।। कच्ची सुपारी-गुरु, अभिष्यन्दी, एवम्-जठराग्नि तथा दृष्टि को मन्द करनेवाली होती है। स्विन्न (चिकनी) सुपारी-त्रिदोषनाशक होती है तथा जिसका मध्यभाग दृढ़ हो, वह सुपारी उत्तम होती है। [५१] १३. सुपारी हिं०-सुपारी, सोपारी, सुपाड़ी, कसेली। बं०-शुपारी, सुपारी। म०-सुपारी, पोफल (फल)। गु०-सोपारी। ता०-कमुगु। क०-कडि, अडिके। ते०-पोका। फा०-पोपिल। अ०-फोफिल। अं०-Betel Nut Palm (बेटल् नट् पाम)। ले०-Areca catechu Linn. (ऐरेका कॅटेचू)। Fam. Palmae (पामी)। सुपारी एक बहुत प्रसिद्ध वस्तु है जो प्रतिदिन के व्यवहार में पान के साथ या अकेली खाने के काम आती है। इसके वृक्ष-बंगाल, आसाम, सिलहट, मैसूर, कनारा, मलावार तथा दक्षिण हिन्दुस्तान के कई प्रान्तों में तटीय प्रदेशों में लगाये हुये पाये जाते हैं। यह वृक्ष-ताड़ और नारियल के समान ऊँचा (४०-६० फीट) पर बाँस के समान पतला होता है। पत्ते-बड़े- बड़े, पक्षवत्, नारियल के पत्तों के समान ४ से ६ फीट लम्बे, जिनमें ऊपर के उपपक्ष (Pinnae) मिले हुये तथा वन्त का नीचे का भाग चौड़ा तथा फैला हुआ होता है। फूल-पत्रकोशावृत्त गुच्छ में, जिनमें पुंपुष्प छोटे, अधिक तथा स्त्रीपुष्प बड़े रहते हैं। फल-अंडाकार, १ १/२-२" चौड़ा तथा २-२ १/२" लम्बा एवं पकने पर चमकीले नारंगी रंग का होता है जिसके अन्दर सुपारी (बीज) रहती है। सुपारी आकार, नाप तथा स्वाद आदि के अनुसार अनेक प्रकार की होती है। परन्तु एक साधारण सुपारी (धूसर भूरे रंग की) और दूसरी (लाल सुपारी) दक्षिणी सुपारी ये ही दो प्रसिद्ध हैं। इनमें से दूसरी उबाल कर बनाते हैं। पकने से कुछ पूर्व सुपारी को निकाल कर जल तथा पूर्व वर्ष के तैयार 'घन' (छोगारू) में उबालते हैं। नया क्वाथ बनाना हो तो जामुन, लाल चंदन, पीपल इत्यादि की छाल से बनाते हैं। इससे स्वाद, टिकाऊपन तथा रंग अच्छा हो जाता है तथा इसके दोष दूर हो जाते हैं। बालू में भूनकर खाने से भी दोष दूर हो जाते हैं। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmau. Digitized by S3 Foundation USA