भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 770, कुल 1167 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 770

आम्रादिफलवर्गः ७९९ ११. खरबूजा हिं०-खरबूज, खरबूजा, खर्बूजा, चिबुड। बं०-खरमुज। म०-खरबूज। गु०-तलिया शकर तेटी, तलियाभीमड़ा। ते०-खरबूज। क०-षड्भुजा। फा०-खरपुजह, खरपुजा। अ०-वितिख, खर्पुजह, खरपुजाह। अं०-Melon (मेलन)। ले०-Cucumis melo Linn. (क्युम्युमिस् मेलो)। Fam. Cucurbitaceae (कुकुरबिटेसी)। प्रायः सब प्रान्तों के खेतों में यह रोपण किया जाता है। उत्तर पश्चिमी उष्ण तथा शुष्क प्रदेशों में अधिक रोपण किया जाता है। नदियों के किनारे रेतीली भूमि में यह अधिक उत्पन्न होता है। इसकी लता-भूमि पर पसरी हुई रहती है। पत्ते-रोमश, गोलाकार एवं उनमें कहीं-कहीं नोकसा निकला रहता है। फूल-पीले रंग के आते हैं। फल-गोलाकार कुछ चिपटे रहते हैं। पकने पर वे किञ्चित् हरापन युक्त पीले रंग के या सफेदी मायल हो जाते हैं। उनके चारों ओर रेखायें रहती हैं जो नीले रंग की होती हैं। गूदी के भीतर बीजों के समूह का लसीला गोला रहता है। बीज-लम्बाई युक्त चिपटे होते हैं। बीजों का चिकित्सा में प्रयोग करते हैं। रासायनिक संगठन-बीजों में तेल होता है। फल में खटिक, ताम्र, फॉस्फोरस, लोह तथा विटामिन 'ए', 'बी₁', 'बी₂' तथा 'सी' आदि द्रव्य होते हैं। गुण और प्रयोग-बीज शीतल, मूत्रजनन एवं बल्य हैं; फल शीतल हैं तथा पुराने एक्जीमा के लिए लाभदायक माने जाते हैं। मूत्रकृच्छ्र में बीज देते हैं। अथ त्रपुसम् (खीरा, बालमखीरा)। तस्य नामानि पक्वापक्वतत्फलतद्बीजगुणांश्चाह त्रपुसं कण्टकिफलं सुधावासः सुशीतलम्। त्रपुसं लघु नीलञ्च नवं तृट्क्लमदाहजित् ।।४६।। स्वादु पित्तापहं शीतं रक्तपित्तहरं परम्। तत्पक्वमम्लमुष्णं स्यात्पित्तलं कफवातनुत्।। तद्बीजं मूत्रलं शीतं रूक्षं पित्तास्रकृच्छ्रजित् ।।४८।। खीरा के संस्कृत नाम-त्रपुस, कण्टकिफल, सुधावास तथा सुशीतल ये सब हैं। खीरे के छोटे, नीले तथा नवीन फल-स्वादिष्ट, शीतल एवम्-प्यास, क्लान्ति, दाह तथा पित्त को दूर करनेवाले होते हैं और रक्तपित्त को तो अत्यन्त नष्ट करनेवाले होते हैं। खीरे के पके फल-अम्लरसयुक्त, उष्ण, पित्तजनक एवम्-कफ तथा वात को नष्ट करनेवाले होते हैं। खीरे के बीज-मूत्रजनक, शीतल, रूक्ष एवम्-पित्त, रक्तविकार तथा मूत्रकृच्छ्र को दूर करनेवाले होते हैं। [४७-४८] १२. खीरा हिं०-खीरा, बालमखीरा। बं०-क्षीरा, शशा। म०-तौसे। क०-तसेयकायि। गु०-तांसली। ते०- दोसकाई। ता०-मुल्लुवेल्लेरी। फा०-शियार खुर्द, खयार, बावरंग। अ०-कंशद। अं०-Cucumber (क्युकुम्बर)। ले०-Cucumis sativus Linn. (क्युम्युमिस सटाइवस्)। Fam. Cucurbitaceae (कुकुर्बिटेसी)। प्रायः सब प्रान्तों में इसकी खेती की जाती है। इसकी बेल-खेतों में फैली हुई रहती है। पत्ते-५-६ इञ्च के घेरे में गोलाकार और पाँच कोण वाले होते हैं। फूल-पीले रंग के आते हैं। फल-६ से १२ इञ्च तक लम्बे होते हैं और उनमें ककड़ी के समान बीज होते हैं। एक बड़ी जाति का खीरा होता है जिसको बालम खीरा कहते हैं। इसकी लम्बाई अधिक होती है। इसका एक प्रकार 'मुंडोसा' मद्रास की तरफ अधिक प्रचलित है जिसके फलों पर छोटे काँटे होते हैं।