भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

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७१८ भावप्रकाशनिघण्टुः होता है। क्षय में इसका उपयोग काडलिवर आईल की तरह करते हैं। (३) इसकी ताड़ी या उससे बना मद्य दाहशामक, मूत्रल, बल्य, सौमनस्यजनन, निद्राजनन, वाजीकरण एवं बृंहण होता है। (४) इसके पुष्प ग्राही होते हैं। (५) चिपटे कृमि के लिये एक नारियल की गरी खिलाते हैं किन्तु साथ में विरेचन देना आवश्यक है। (६) इसका मूल मूत्रल एवं कषाय है तथा अश्मरी, प्रमेह एवं अत्यार्तव में इसका क्वाथ देते हैं। (७) इसके कवच को जलाकर निकाला तेल चर्मरोगों में बाहर से प्रयुक्त होता है। (८) नारियल का दूध क्षय, दुर्बलता आदि में तथा शस्त्रक्रिया के पूर्व एवं पश्चात् पिलाते हैं जिससे 'शाक' एवं रक्तस्राव का भय नहीं रहता।

अथ कालिन्दम् (तरबूज)। तन्नामानि पक्वापक्वतत्फलगुणाँश्चाह

कालिन्दं कृष्णबीजं स्यात्कालिङ्गञ्च सुवर्तुलम्। कालिन्दं ग्राहि दृक्पित्त शुक्र हृच्छीतलं गुरु।। पक्वन्तु सोष्णं सक्षारं पित्तलं कफवातजित् ।।४३।। तरबूज के संस्कृत नाम-कालिन्द, कृष्णबीज, कालिङ्ग तथा सुवर्तुल ये सब हैं। तरबूज के कच्चे फल- ग्राही, शीतल, गुरु एवम्-दृष्टि की शक्ति, पित्त तथा शुक्र नष्ट करने वाले होते हैं। पके फल-उष्ण, क्षारायुक्त, पित्तजनक, एवम्-कफ तथा बात को दूर करने वाले होते हैं। [४३]

१०. तरबूज

हिं०-तरबूज, तरबूजा। बं०-तरमुज। म०-कलिंगड। गु०-तड़बूज। ता०-कोंमाट्टि। ते०-पुच्चकाया, तरबूजं। फा०-हिन्दबाना, हिन्ददानह। अ०-वतिख हिन्दी, जकी। अं०-Watermelon (वाटर मेलन्)। ले०- Citrullus vugaris Schrad (सिट्र्युलस् बल्गौरिस्)। Fam. Cucurbitaceae (कुकुरविटेसी)। प्रायः सब प्रान्तों में इसकी खेती की जाती है। नदियों के किनारे, दियारे पर एवं रेतीली भूमि में अच्छा फल लगता है। इसकी खुरदरी लता-खेतों में पसरी हुई रहती है। पत्ते-इन्द्रायन के पत्तों के समान गहरे कटे किनारे वाले होते हैं। फूल-एक इञ्च के घेरे में गोलाकार होते हैं। फल-बड़े-बड़े पेठे और कोहड़े के आकार वाले होते हैं। गूदी- लाल या सफेद होती है। बीज-चिपटे, लाल, भूरे या काले होते हैं। [११] रासायनिक संगठन-बीजों में २० से ४०% पीले रंग का तेल होता है। फल में काफी मात्रा में पेक्टिन तथा रस में सिट्र्यूलिन ०.१७% होता है। गुण और प्रयोग-बीज शीतल, मूत्रजनन तथा बल्य होते हैं। बीजों का तेल बादाम के तेल के स्थान में उपयोग में आता है। फल मूत्रल तथा शीतल होता है।

अथ खर्बूजम् (खर्बूजा)। तन्नामानि तत्फलगुणाँश्चाह

दशाङ्गुलं तु खर्बूजं कथ्यन्ते तद्गुणा अथ।।४४।। खर्बूजं मूत्रलं बल्यं कोष्ठशुद्धिकरं गुरु। स्निग्धं स्वादुतरं शीतं वृष्यं पित्तानिलापहम् ।।४५।। खर्बूजा के संस्कृत नाम-दशाङ्गुल और खर्बूजा ये हैं। खर्बूजा के फल-अत्यन्त स्वादिष्ट, मूत्रजनक, बलकारक, कोष्ठशुद्धि करनेवाले, गुरु, स्निग्ध, शीतल, वृष्य (वीर्यवर्धक) एवम्-पित्त तथा वायु को दूर करने वाले होते हैं। इनमें जो अम्ल, मधुर एवम् क्षार रसयुक्त होते हैं वे रक्तपित्त तथा मूत्रकृच्छ्र को अत्यन्त करने वाले होते हैं। [४४-४५] CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA