भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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आम्रादिफलवर्गः ७३७ है। रसदार फूलों (Corollas–अन्तर्दल) को आटे में मिलाकर रोटी बनाकर गरीब लोग खाते हैं। इसके तेल का उपयोग किया जाता है। इसके फूलों से मद्य बनाया जाता है। थोड़ा सा तैयार मद्य फूलों में रहता है जिससे इनको खाने से कुछ नशा हो जाता है। इसका मद्य स्वाद में तेलिया, कषाय एवं धूएँ जैसा दुर्गन्धी रहता है जो रखने से कुछ सुधरता है। रासायनिक संगठन–इसमें सॅपोनिन तथा अन्य क्षाराभ होता है। गुण और प्रयोग–इसका नया मद्य अहितकारक होता है तथा इससे आमाशय में दाह, अनिद्रा, शिरःशूल, बेचैनी एवं मानसिक विकार होते हैं। पुराना मद्य काम में लाया जा सकता है। इसके फूल शीत, पौष्टिक एवं स्नेहन होने के कारण इनका क्वाथ ज्वर एवं कास में देते हैं। अंडशोथ में फूलों से सेकते हैं। इनको घी में भूनकर अर्शवालों को देते हैं। इसकी छाल का खुजली और सन्धिव्रात में उपयोग किया जाता है। तैल वातनाशक होता है। ३६. जलमहुआ हिं०–जलमहुआ। बं०–जल मउल। म०–जलमोहा। क०–तोरे इप्पे। ते०–पित्रा। गु०–जलमहुडो। क०–जल मह्वे। ता०–इल्लपि। ले०–Bassia longifolia Linn. (बेसियॉ लाँगीफोलिया)। Fam. Sapotaceae (सॅपोटेसी)। जलमहुआ–नदी नालों के किनारे या आर्द्र जंगलों में उत्पन्न होता है। यह दक्षिण में अधिक होता है। इसके वृक्ष पत्ते आदि महुवे के समान होते हैं पर उनसे छोटे होते हैं। नोट–उपर्युक्त वृक्ष के गुण कर्म महुवे के सदृश ही होते हैं। इसे भावप्रकाश में जल में होने वाला लिखा है किन्तु यह जल के अन्दर नहीं होता। अथ परूषकम् (फालसा)। तस्य नामानि तत्पक्वापक्वफलगुणाँश्चाह परूषकं तु परुषमल्पास्थि च परापरम्। परूषकं कषायाम्लमामं पित्तकरं लघु ॥९८॥ तत्पक्वं मधुरं पाके शीतं विष्टम्भि बृंहणम्। हृद्यन्तु पित्तदाहास्त्रज्वरक्षयसमीरहत् ॥९९॥ फालसा के संस्कृत नाम–परूषक, परुष, अल्पास्थि तथा परापर ये सब हैं। फालसा के कच्चे फल–कषाय तथा अम्ल रसयुक्त, पित्तकारक तथा लघु होते हैं। पके फलविपाक में मधुर रसयुक्त, शीतल, विष्टम्भक, बृंहण (रस-रक्तादिवर्धक), हृदय के लिए हितकर एवम् पित्त, दाह, ˙क्तविकार, ज्वर, क्षय तथा वात को दूर करने वाले होते हैं। [९८-९९] ३७. फालसा हिं०–फालसा। बं०–फलूसा। म०–फालसा। क०–वेड्ढा, दागल। ते०–चिट्टित। गु०–फालसा। फा०– फालसा, पालसह। अ०–फालसह। ले०–Grewia asiatica Linn. (ग्रिविया शियाटिका)। Fam. Tiliaceae (टिलिएसी)। इसको अनेक प्रान्तों के लोग बागों में रोपण करते हैं। इसकी अन्य जातियों को भी फालसा कहा जाता है। इसका वृक्ष–छोटा होता है। पत्ते–४-५ इञ्च लम्बे, २-२॥ इञ्च चौड़े गोलाकार एवं दंतुर होते हैं। दन्त अनियमित होते हैं तथा आधार की तरफ कुछ तिरछे होते हैं। फूल–झुमको में पीले रंग के आते हैं। फल–मटर के समान गोल, कच्ची अवस्था में हरे रंग के और पकने पर जामुनी रंग के हो जाते हैं। इसका स्वाद खट्टा तथा कुछ मधुर होता है। इसका शरबत बनाकर लोग गरमी के दिनों में पीते हैं। रासायनिक संगठन–फल में साइट्रिक अम्ल, शर्करा तथा अल्प विटामिन ‘सी’ होता है। गुण और प्रयोग–इसके पके फल शीत, विष्टम्भि, पित्तशामक, हृद्य एवं तृष्णाशामक हैं। ५० भाव.I CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA