भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

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७३६ भावप्रकाशनिघण्टुः इसकी पेया अतिसार, आँव एवं प्रदर में दी जाती है। पित्त प्रकृति वालों को तथा गर्भिणी को इससे लाभ होता है। अथ कैरविणीफलम् (भेंट) तस्य नामानि गुणाँश्चाह उक्तं कुमुदबीजन्तु बुधैः कैरविणीफलम् । भवेत्कुमुद्वतीबीजं स्वादु रूक्षं हिमं गुरु ।।९४।।। कुमुदनी बीज के संस्कृत नाम-कुमुद्वतीबीज, कैरविणीफल तथा कुमुदबीज ये सब विद्वानों ने बताये हैं। कुमुदनी के बीज-स्वादिष्ट, रूक्ष, शीतल तथा पाक में गुरु होते हैं। [९४] ३४. कैरविणीफल (बेरा) हिं०-बेरी, कुमुद के बीज, कुमुदबीज, बेरा, घंघोल के दाने, भटबेरा, भेटबेरा। बं०-हेलाबीज, सुन्दी बीज। गु०-पोयणानाबीज। फा०-तुख्म नीलोफर। अ०-करनबुल् माय। कुमुद फूल के बीज को कैरविणीफल कहते हैं। इसके सम्बन्ध में अन्य वर्णन पुष्पवर्ग में कुमुद के अन्तर्गत (पृष्ठ ६४४) किया जा चुका है। अथ मधूकः (महुआ, बनमहुआ)। तस्य नामानि तत्पुष्पफलगुणाँश्चाह मधूको गुडपुष्पः स्यान्मधुपुष्पो मधुस्रवः । वानप्रस्थो मधुष्ठीलो जलजेऽत्र मधूलकः ।।९५।। मधूकपुष्पं मधुरं शीतलं गुरु बृंहणम् । बलशुक्रकरं प्रोक्तं वातपित्तविनाशनम् ।।९६।। फलं शीतं गुरु स्वादु शुक्रलं वातपित्तनुत् । अहृद्यं हन्ति तृष्णाऽस्रदाहश्वासक्षतक्षयान् ।।९७।। महुआ के संस्कृत नाम-मधूक, गुडपुष्प, मधुपुष्प, मधुस्रव, वानप्रस्थ तथा मधुष्ठील ये सब हैं। जो महुआ जल में होता है उसे "मधूलक" कहते हैं। महुवे के फूल-मधुर, शीतल, गुरु, बृंहण (रसरक्तादि-वर्धक), बल तथा शुक्रजनक एवम्-वात और पित्त को दूर करने वाले होते हैं। महुवे के फल-स्वादिष्ट, शीतल, गुरु, शुक्रजनक, हृदय के लिए अहितकर, वात तथा पित्त को दूर करने वाले एवम्-तृषा, रक्तविकार, दाह, श्वास, क्षत तथा क्षय नाशक हैं। [९५-९७] ३५. महुआ हिं०-महुआ, महुया, महुवा। बं०-मौल, मउल म०-मोहड। गु०-महुडो। क०-इष्पेमरा। ते०-इपा, पिन्ना, इप्प। ता०-कटइल्लुपि। फा०-गुलचर्का ले०-Bassia latifolia Roxb. (बेसिय लैटिफोलिया)। Fam. Sapotaceae (सॅपोटेसी)। यह बंगाल, बिहार, युक्तप्रान्त, मध्यभारत, दक्षिण आदि प्रान्तों में लगाया हुआ पाया जाता है और कुमाऊँ की तराइयों में आप ही आप जंगली उत्पन्न होता है। इसका वृक्ष-बड़ा हुआ करता है और सदा हराभरा रहता है। पत्ते-५ से ९ इञ्च तक लम्बे, चर्मवत्, दीर्घवृत्ताभ या आयताकार-दीर्घवृत्ताभ, किंचित् लम्बाग्र, आकार गोल या संकुचित, १० से १४ शिराओं से युक्त टहनियों के अन्त में एक साथ गुच्छों में रहते हैं। फूल-सफेद रंग के गूदेदार छोटी-छोटी शाखाओं के अन्त में गुच्छों में आते हैं और वे सूखने पर दाख के समान हो जाते हैं। फल-१ से २ इंच लम्बे, अंडाकार, नुकीले, गूदेदार तथा हरिताभ पीत रंग के होते हैं। बीज-किञ्चित् लाली युक्त बीज होते हैं। उनके भीतर सफेद गूदी होती है। गूदी से तेल निकाला जाता CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammu. Digitized by S3 Foundation USA