भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआम्रादिफलवर्गः ७३५ ३२. मखाना हिं०-मखाना, मखान्ना। बं०-माखाना। गु०-मखाणा। म०-मखाणे, मकाणे। ते०-मेल्लुनिपदममु। प०-जवेर। अं०-Fox nut (फॉक्स नट), Gorgon fruit (जार्गन फ्रूट)। ले०-Euryale ferox Salisb. (युरीएल फेराक्स)। Fam. Nymphaeaceae (निम्फिएसी)। यह उत्तर, मध्य तथा पश्चिम भारत के स्वच्छ पानी के तालाबों तथा झीलों में होता है। इसका क्षुप-कांडहीन, काँटेदार तथा कमल के समान जल में होता है। पत्ते-कमल के समान, तैरते हुये, गोलाकार, १ से ४ फीट व्यास में, ऊपर से हरे किन्तु नीचे से लाल या बैंगनी, मृदुरोमश एवं शिराओं पर काँटों से युक्त होते हैं। फूल-१-२ इञ्च लम्बे, भीतर की ओर लाल चमकीले और बाहर से हरे रंग के होते हैं। फल-दो से चार इञ्च के घेरे में गोलाकार एवं काँटेदार होते हैं। बीज-मटर या मटर से कुछ बड़े होते हैं। यह संख्या में ८ से २० एवं काले रहते हैं। इन्हें कच्चे या भूनकर खाते हैं। बालू में भूनने से ये फूल जाते हैं जिन्हें मखाना कहा जाता है। इसका आटा अरारूट के समान होता है। रासायनिक संगठन-सौ भाग मखाने में प्रोटीन ९.७, आर्द्रता १२.८, कार्बोहाइड्रेट ७६.९, स्नेह ०.१; लोह १.४ मि० ग्रा० १०० ग्राम में एवं अल्प खटिक, फॉस्फोरस तथा कैरोटीन आदि द्रव्य पाये जाते हैं। गुण और प्रयोग-मखाना बल्य, वाजीकर एवं ग्राही है। इसको प्रसवान्त दौर्बल्य, शुक्रस्राव एवं वीर्याल्पता में दूध में पकाकर खिलाते हैं। यह सुपाच्य होता है तथा आहार के रूप में इसका उपयोग किया जा सकता है। अथ शृङ्गाटकम् (सिंघाड़ा) । तस्य नामानि गुणांश्चाह । शृङ्गाटकं जलफलं त्रिकोणफलमित्यपि ।।९२।। शृङ्गाटकं हिमं स्वादु गुरु वृष्यं कषायकम्। ग्राही शुक्रानिलश्लेष्मप्रदं पित्तास्रदाहनुत् ।।९३।। सिंघाड़ा के संस्कृत नाम-शृङ्गाटक, जलफल तथा त्रिकोणफल ये सब हैं। सिंघाड़ा-स्वादिष्ट तथा कषायरसयुक्त, शीतल, गुरु, वृष्य (वीर्यवर्धक), ग्राही, शुक्र, वात तथा कफजनक एवम्- पित्त, रक्तविकार और दाह को दूर करने वाला होता है। [९२-९३] ३३. सिंघाड़ा हि०-सिंघाड़ा(रा) सिंहाड़ा(रा)। बं०-पानिफल, सिंगाड़े। म०-शिंगाड़े, शेंगाड़ा। गु०-शींघोड़ा। क०- सिंगाड़े। ते०-परिकिगडु। अं०-Water caltrops (वाटर कॅलट्राँप्स); Water Chestnut (वाटर चेस्टनट)। ले०-Trapa bispinosa Roxb. (ट्रॅपा वाइस्पाईनोसा)। Fam. Onagraceae (ओनेग्रेसी)। सिंघाड़ा-प्रसिद्ध पानीय फल अनेक प्रान्तों के बड़े छोटे ताल तलैयों में उत्पन्न होता है। इसका जलीय क्षुप- जलकुम्भी के समान पानी के ऊपर फैला रहता है। पत्ते-जलकुम्भी के समान होते हैं परन्तु वे त्रिकोणाकार होते हैं। फूल-सफेद आते हैं जो शाम को फूलते हैं। फल-त्रिधारे होते हैं और उनके ऊपर २ काँटे होते हैं जो देखने में बैल के सिर की तरह दिखलाई देते हैं। छिलका-मोटा होता है और गुदी सफेद होती है। फल को उबाल कर या कच्चा ही छिलका निकाल कर आहार के रूप में खाया जाता है। काश्मीर में एक बिना काँटे की जाति पाई जाती है। रासायनिक संगठन-इसमें मँगॅनीज तथा स्टार्च होता है। गुण और प्रयोग-यह शीत, पौष्टिक, वृष्य, शोणितास्थापन ग्राही, दीपन, दाहहर एवं श्रमहर है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA