भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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पृष्ठ 785

७३४ भावप्रकाशनिघण्टुः कण्टाई के संस्कृत नाम-विकङ्कत, स्रुवावृक्ष, ग्रन्थिल, स्वादुकण्टक, यज्ञवृक्ष, कण्टकी तथा व्याघ्रपाद् ये सब हैं। कण्टाई के फल-यदि पके हों तो वे मधुर रसयुक्त सभी दोषों को दूर करने वाले होते हैं। [८८] ३०. विकंकत (कंटाई) हिं०-कंटाई, बिलंगरा, कंजू। बं०-बइञ्चि गाछ, बैंची। म०-बेहकल काकेर। गु०-कांकोड। क०- हलुमाणिका। ते०-कानवेगु चेट्टु। ता०-सोट्टैटैकला। अं०-Governor's Plum (गवर्नर्स प्लम)। ले०- Flacourtia ramontchi L' Herit (फ्लेकोर्शिया रामोंशी)। Fam. Flacourtiaceae (फ्लेकोर्शियेसी)। यह हिमालय, बिहार, मध्यभारत, दक्खन, कोंकण आदि प्रदेशों में उत्पन्न होता है। इसका वृक्ष-छोटा होता है। शाखाओं पर काँटे रहते हैं। पत्ते-विभिन्न आकार के, चमकीले, प्रायः ४ इञ्च से कम लम्बे, वृत्ताकार या आयताकार-अभिलट्वाकार, कुंठिताग्र एवं गोल या आरावत् दन्तुर होते हैं। फूल-पीताभ हरित और बारीक होते हैं। फल-आध इञ्च के घेरे में गोलाकार, गूदेदार, चिकने और पकने पर गहरे बैंगनी या लाल हो जाते हैं। बीज-अनेक तथा छोटे-छोटे होते हैं। इसके कई भेद पाये जाते हैं। फलों का स्वाद तीक्ष्ण किंतु मधुर होता है तथा गंध भी अच्छी होती है। गुण और प्रयोग-फल दीपन एवं पाचन होते हैं। कामला एवं प्लीहा वृद्धि में फल देते हैं। छाल कषाय एवं मूत्रल होती है। अथ पद्माक्षम् (कमलगट्टा) । तस्य नामानि गुणाँश्चाह पद्मबीजं तु पद्माक्षं गालोड्यं पद्मकर्कटी। पद्मबीजं हिमं स्वादु कषायं तिक्तकं गुरु ॥८९॥ विष्टम्भि वृष्यं रूक्षञ्च गर्भसंस्थापकं परम् । कफवातकरं बल्यं ग्राहि पित्तास्रदाहनुत् ॥९०॥ कमलगट्टा के संस्कृत नाम-पद्मबीज, पद्माक्ष, गालोड्य तथा पद्मकर्कटी ये सब हैं। कमलगट्टा-स्वादिष्ट, कषाय तथा तिक्तरसयुक्त, शीतल, गुरु, विष्टम्भक, वृष्य (वीर्यवर्धक), रूक्ष, गर्भ को विशेषतः स्थापित करनेवाला, कफ तथा वातजनक, बलदायक, ग्राही एवम् पित्त, रक्तविकार या रक्तपित्त और दाह को दूर करने वाला होता है। [८९-९०] ३१. कमलगट्टा हिं०-कमलगट्टा, कमल के बीज। बं०-पद्म बीचि। म०-कमलाक्ष, कमलाचे बीज। गु०-कमल काकड़ी, पबड़ी। क०-ताबड़े बीज, पद्माक्ष। ते०-तामरकारा, तामरकाई। यू०-गुलहार। अ०-बालके कुवति। कमल के बीजों को कमलगट्टा कहते हैं। यह रीठे की गुठली के समान परन्तु लम्बाई युक्त गोल तथा चिकना होता हैं और कमलकोष के भीतर से निकलता है। छिलका-कठोर होता है और गिरी सफेद होती है। गिरी के बीच में हरे रंग की पत्ती रहती हैं। उसको निकाल कर व्यवहार में लाना चाहिये। नोट-अन्य वर्णन कमल के साथ (पृष्ठ ४८०) किया गया है। अथ मखान्नम् (मखाना) । तस्य नामानि गुणाँश्चाह मखान्नं पद्मबीजाभं पानीयफलमित्यपि। मखान्नं पद्मबीजस्य गुणैस्तुल्यं विनिर्दिशेत् ॥९१॥ मखाना के संस्कृत नाम-मखान्न, पद्मबीजाभ तथा पानीयफल ये सब हैं। मखाना-गुणों में कमलगट्टा के समान ही समझना चाहिये। [९१] CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA

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