भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

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आम्रादिफलवर्गः ७३३ यह इस देश के गरम और सूखे प्रान्तों में अधिक पाई जाती है। चिरौंजी का वृक्ष-मध्यमाकार का होता है। कहीं-कहीं ५० फीट तक ऊँचा वृक्ष देखा जाता है। छाल-मोटी, गहरे धूसर वर्ण की एवं चौकोर आकार में फटी हुई होने से मगर के चमड़े की तरह दिखलाई देती है। पत्ते-कड़े, अखण्ड, आयताकार या लट्वाकार-आयताकार एवं ६-१० इञ्च लम्बे होते हैं। फूल-श्वेत एवं मञ्जरियों में चौथाई इञ्च के घेरे में गोलाकार होते हैं। फल-लम्बाई युक्त गोलाकार दबे हुए, १/२ इञ्च व्यास के, एक बीजयुक्त तथा काले रंग के होते हैं। फल तथा उसके भीतर की मज्जा जिसे चिरौंजी कहते हैं खाई जाती है। इसके वृक्ष से गोंद भी निकलता है। रासायनिक संगठन-मज्जा में ५१.८% तेल, २१.६% प्रोटीन तथा ५% शर्करा होती है। तेल हलके पीले रंग का, सुगंधित तथा बादाम या जैतून के तेल सदृश होता है। छाल में टैनिन होता है। गुण और प्रयोग-चिरौंजी बहुत अच्छी पौष्टिक एवं बृंहण है। इसको बादाम के स्थान पर उपयोग में ला सकते हैं। इसकी पेया खाँसी में दी जाती है। बालों को काला बनाने के लिये तेल का उपयोग करते हैं। त्वचा के रोगों में इसका उबटन बनाकर लगाते हैं। गोंद का उपयोग अतिसार में करते हैं। अथ राजादनः (खिरनी)। तस्य नामानि तत्फलगुणाँश्चाह राजादनः फलाध्यक्षो राजन्यो क्षीरिकाऽपि च ।।८६।। क्षीरिकायाः फलं वृष्यं बल्यं स्निग्धं हिमं गुरु। तृष्णामूर्च्छामदभ्रान्तिक्षयदोषत्रयास्रजित् ।।८७।। खिरनी के संस्कृत नाम-राजादन, फलाध्यक्ष, राजन्या तथा क्षीरिका ये सब हैं। खिरनी के फल-वृष्य, बलकारक, स्निग्ध, शीतल, गुरु एवम्-तृषा, मूर्च्छा, मद, भ्रान्ति, क्षय, त्रिदोष तथा रक्तविकार को दूर करने वाले होते हैं। [८६-८७] २९. खिरनी हिं०-खिरनी, खिर्नी, खित्री। बं०-खीर खजूर। म०-खिरणी, रांजण। गु०-रायण काकडिआ। क०- खिरणी मारा। ता०-पल्ल, पलै। ते०-पालमानु। ले०-Mimusops hexandra Roxb. (माइमुसोप्स हेक्सैंड्रा)। Fam. Sapotaceae (सॅपोटेसी)। यह प्रायः सब प्रान्तों में पायी जाती है। विशेषकर दक्खन से गुजरात तक और बान्दा में अधिक मिलती है। इसके वृक्ष कहीं बड़े और कहीं छोटे दिखाई पड़ते हैं। पत्ते-२-३ इञ्च लम्बे, १-१।। इञ्च चौड़े अंडाकार होते हैं और वे टहनियों के अन्त में सघन रहते हैं। फूल-चक्राकार, छोटे-छोटे सफेद या फीके पीले रंग के आते हैं। फल- आध इञ्च तक लम्बे, चिपटे और पकने पर पीले हो जाते हैं। इसकी लकड़ी कड़ी होती है। इसके फल खाये जाते हैं। छाल तथा बीज तैल का उपयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन-इसके फल में फल शर्करा ७०% होती है। बीजों में तेल पाया जाता है। गुण और प्रयोग-छाल संग्राही है एवं तेल बल्य तथा स्नेहन होता है। छाल का प्रयोग वकुल की छाल की तरह किया जाता है। अथ विकङ्कतः (कण्टाई)। तस्य नामानि तत्पक्वफलगुणाँश्चाह विकङ्कतः स्रुवावृक्षो ग्रन्थिलः स्वादुकण्टकः। स एव यज्ञवृक्षश्च कण्टकी व्याघ्रपादपि ।। विकङ्कतफलं पक्वं मधुरं सर्वदोषजित् ।।८८।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA