भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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पृष्ठ 783

७३२ भावप्रकाशनिघण्टुः करौंदा के संस्कृत नाम—करमर्द, सुषेण तथा कृष्णापाकफल ये सब हैं। इसकी अपेक्षा छोटे फल जिसके हों उसे संस्कृत में 'करमर्दिका' कहते हैं। दोनों प्रकार के करौंदे के कच्चे फल—अम्ल (खट्टे), पाक में गुरु, तृष्णानाशक, उष्ण, रुचिजनक तथा रक्तपित्त और कफ के वर्धक होते हैं। पके फल—मीठे, रुचिजनक, लघु, एवम्—पित्त तथा वायु के नाशक होते हैं। [८१-८२] २७. करोंदा हिं०—करोंदा, करौंदा। बं०—करमचा। म०—करवंद। गु०—करमदां। क०—करिजिगे। ते०—वाका, करवन्दे। ता०—कलक्के। ले०—Carissa carandas Linn. (केरिसा कॅरण्डस्)। Fam. Apocyuaceae (एपोसाइनेसी)। यह प्रायः बाग-बगीचों में रोपण किया जाता है तथा सभी भागों में होता है। इसका वृक्ष—छोटा, झाड़दार और सदा हरा-भरा रहता है। इस पर तीक्ष्ण युग्म काँटे होते हैं। पत्ते—१।।-२ इञ्च लम्बे, १-१।। इञ्च चौड़े नींबू के पत्तों के समान होते हैं। फूल—सफेद रंग के आते हैं और उनसे सुगन्ध आती है। फल— झरबेर के आकारवाले, ½-१ इञ्च लम्बे, काले या सफेदी युक्त लाल रंग के होते हैं। इनका स्वाद अत्यन्त खट्टा होता है। इसकी अन्य दो तीन जातियाँ होती हैं जिनमें से एक दक्षिण की तरफ होती है जिसमें फल बड़े होते हैं तथा अन्य छोटे फल वाली सभी स्थानों पर होती है जिसे मूल में करमर्दिका कहा गया है। गुण और प्रयोग—इसके फल, मूल तथा पत्तों का उपयोग किया जाता है। यह शीतल, रक्तपित्तशामक एवं हृद्य है। यह प्रशीताद नामक मसूढ़े के रोग में जिसमें मसूढ़े से खून आता है, लाभदायक हैं। इसकी जड़ कटु, तिक्त, वामक एवं मूत्रजनन है। इसका उपयोग सर्प ने काटा है या नहीं इसकी परीक्षा के लिये करते हैं। इसको शीत जल में घिसकर पिलाते हैं। यदि साँप ने काटा है तो वमन नहीं होता। नींबू के रस में कपूर के साथ इसे घिसकर बच्चों को होने वाले सफेद पानीदार फोड़ों पर लेप करते हैं। विषमज्वर में पत्तों का क्वाथ पिलाते हैं। अथ प्रियालः (चिरौंजी)। तस्य नामानि तत्फलस्य च गुणाँश्चाह प्रियालस्तु खरस्कन्धश्चारो बहुलवल्कलः। राजादनस्तापसेष्टः सन्नकद्रुर्धनुष्पटः ।।८३।। चारः पित्तकफास्रघ्नस्तत्फलं मधुरं गुरु। स्निग्धं सरं मरुत्पित्तदाहज्वरतृषाऽपहम् ।।८४।। चिरौंजी के संस्कृत नाम—प्रियाल, खरस्कन्ध, चार, बहुलवल्कल, राजादन, तापसेष्ट, सन्नकद्रु और धनुष्पट ये सब हैं। चिरौंजी—पित्त, कफ तथा रक्तविकार को दूर करने वाली होती है। चिरौंजी के फल—मधुर, गुरु, स्निग्ध, मलसारक एवं—वात, पित्त, दाह, ज्वर तथा तृषा को दूर करने वाले होते हैं। [८३-८४] अथ तन्मज्जगुणानाह प्रियालमज्जा मधुरो वृष्यः पित्तानिलापहः। हृद्योऽतिदुर्जरः स्निग्धो विष्टम्भी चामवर्द्धनः ।।८५।। चिरौंजी की मींगी—मधुर रसयुक्त, वृष्य (वीर्यवर्धक), हृदय को हितकर, अत्यन्त देर में पचने वाली, स्निग्ध, मल का विष्टम्भ करने वाली, आम को बढ़ानेवाली तथा पित्त और वायु को नष्ट करने वाली होती है। [८५] २८. चिरौंजी हिं०—चिरोंजी, चिरौंजी। बं०—चिरौंजी, पियाल। म०, गु०—चारोली। क०—चारनीज, नरकल। ते०— सारुपपु। ता०—मुड़इमा। फा०—नुकले खाजा, नुकुलख्वाजह। अ०—हब्बुस्समाना, हब्बुल समनह। ले०—Buchanania latifolia Roxb. (बुचनैनिया लेटिफोलिया)। Fam. Anacardiaceae (ॲनेकार्डिएसी)। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA