भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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आम्रादिफलवर्ग: ७३१ छोटे बेर के समान होते हैं। फल-झरबेर के समान गोलाकार, व्यास में .८-१ इंच, खानेलायक और पकने पर लाल हो जाते हैं। इसके फल में विशेष गंध रहती है। गुद्दी भूरापन लिये हरी तथा रसदार रहती है। रासायनिक संगठन-बीजों में तेल होता है। गुण और प्रयोग-यह पित्तशामक है। पित्तप्रकोप में इसको देते हैं। इससे वमन तथा विरेचक रुक जाता है। दंतशूल तथा मसूढ़े से खून आता हो तो इसके पत्ते तथा छाल के क्वाथ से कुल्ला कराते हैं। अथ लवली (हरफारेवडी)। तस्या नामानि तत्फलगुणांश्चाह सुगन्धमूला लवली पाण्डुः कोमलवल्कला ॥७९॥ लवलीफलमश्मार्शःकफपित्तहरं गुरु । विशदं रोचनं रूक्षं स्वाद्वम्लं तुवरं रसे ॥८०॥ हरफारेवड़ी के संस्कृत नाम-सुगन्धमूला, लवली, पाण्डु तथा कोमलवल्कला ये सब हैं। हरफारेवड़ी का फल-विशद गुणयुक्त, रोचक, रूक्ष, गुरु, स्वादिष्ट, अम्ल तथा कषाय रसयुक्त एवम्-पथरी, अर्श, कफ तथा पित्त को नष्ट करनेवाली होती है। [७९-८०] २६. हरफारेवड़ी हिं०-हरफारेवड़ी (री), लवली, हरफरौरी । बं०-नोयाल, हरफल । म०-रायआँवल । गु०-खाटी आँवल । ता०-अरिनेल्लिल । ते०-राच्युयसरिके । क०-करिनेल्लिल । अं०-Star gooseberry (स्टार गूजबेरी), (कण्ट्री गूजबेरी) । ले०-Cicca acida (Linn.) Merrill (सिक्का ॲसिड़ा); Syn. Phyllanthus distichus Muell. Skells (फाइलेन्थस् डिस्टिकस्) । Fam. Euphorbiaceae (युफोर्बिएसी) । प्रायः यह सब प्रान्त की वाटिकाओं में लगाई हुई देखने में आती है। इसका वृक्ष-मध्यमाकार का, २० फीट ऊँचा तथा सुहावना दिखाई पड़ता है। पत्ते-कसौंदी के पत्तों के आकार वाले, सींकों के दोनों ओर एकान्तर लगते हैं। देखने में ये यद्यपि पक्षवत् सपत्रक मालूम होते हैं तथापि ये अपत्रक होते हैं । वसन्त ऋतु में इस पर फूल लगते हैं। फूल-बारीक गुलाबी रंग के गुच्छों में मोटी-मोटी डालियों पर आते हैं। फल-खट्टे, नतशीर्ष, गोल, सतह पर ८ से १० नालियों से युक्त एवं खाने लायक होते हैं। इसको कच्चा या पकाकर, खाते हैं तथा आचार, मुरब्बा आदि भी बनाते हैं। पत्तों का साग बनाते हैं। रासायनिक संगठन-फलों में ॲसेटिक ॲसिड होता है। मूल की छाल में टैनिन्, सॅपोनिन्, गॅलिक ॲसिड तथा एक रवेदार पदार्थ होता है। गुण और प्रयोग-फल अम्ल तथा ग्राही है। मूल तथा बीज विरेचक होते हैं। पत्ते तथा मूल का सर्पविष में प्रयोग किया जाता है। इसके मूल की छाल का रस विषैला रहता है तथा इससे सर में दर्द, सुस्ती, तीव्र उदर शूल तथा मृत्यु होती है। अथ करमर्दः, करमर्दिका च (करौंदा-करौंदी) । तयोर्नामानि पक्वापक्वतत्फलगुणांश्चाह करमर्दः सुषेणः स्यात्कृष्णापाकफलस्तथा । तस्माल्लघुफला या तु सा ज्ञेया करमर्दिका ॥८१॥ करमर्दद्वयं त्वाममम्लं गुरु तृषाहरम् । उष्णं रुचिकरं प्रोक्तं रक्तपित्तकफप्रदम् ॥ तत्पक्वं मधुरं रुच्यं लघु पित्तसमीरजित् ॥८२॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA