भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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आम्रादिफलवर्गः ७३९ अथ दाडिमः (अनार) । तस्य नामानि तत्फलभेदाँश्चाह दाडिमः करको दन्तबीजो लोहितपुष्पकः । तत्फलं त्रिविधं स्वादु स्वादम्लं केवलाम्लकम् ॥१०१॥ अनार के संस्कृत नाम-दाडिम, करक, दन्तबीज तथा लोहितपुष्पक ये सब हैं। फल के भेद-अनार के फल स्वाद में तीन प्रकार के होते हैं। (१) कोई मधुर रसयुक्त, (२) कोई मधुर तथा अम्ल रसयुक्त (३) और कोई केवल अम्ल ही होते हैं। [१०१] अथ तत्फलभेदानां गुणानाह तत्तु स्वादु त्रिदोषघ्नं तृड्दाहज्वरनाशनम् । हृत्कण्ठमुखगन्धघ्नं तर्पणं शुक्रलं लघु ॥१०२॥ कषायानुरसं ग्राहि स्निग्धं मेधाबलावहम् ॥१०३॥ स्वादम्लं दीपनं रुच्यं किञ्चित्पित्तकरं लघु । अम्लन्तु पित्तजनकमार्म वातकफापहम् ॥१०४॥ मीठे अनार-आरम्भ में मीठे अन्त में कसैले, सन्तर्पण करने वाले, शुक्रजनक, लघु, ग्राही, स्निग्ध, मेधा तथा बलवर्धक एवम्-त्रिदोष, तृषा, दाह ज्वर, हृदय तथा कण्ठ-सम्बन्धी रोग, और मुख के दुर्गन्ध को दूर करने वाले होते हैं। कुछ मीठे कुछ खट्टे अनार-अग्निदीपक, रुचिजनक, लघु तथा किंचित् पित्तकारक होते हैं। खट्टे अनार- अम्ल रसयुक्त, पित्तजनक एवम्-आम, वात तथा कफ के नाशक होते हैं। [१०२-१०४] ३९. अनार हिं०-अनार, दाड़िम। बं०-दाड़िम, दालिम गाछ। म०-डालिम्ब। गु०-दाड़म। क०-दालिम्ब। ते०- दालिम्बकाया। ता०-मादलै, मडलै, मडलम। अं०-Pomegranate (पोमेग्रेनेट्)। ले०-Punica granatum Linn. (प्युनिका ग्रॅनेटम्) । Fam. Punicaceae (प्युनिकेसी) । प्रायः सब प्रान्त की वाटिकाओं में अनार के वृक्ष लगाये जाते हैं। यह हिमालय में ३ से ६ हजार फीट तक तथा अफगानिस्तान एवं फारस में वन्य रूप में पाया जाता है। इसका वृक्ष-छोटा अनेक शाखा-प्रशाखा करके झाड़दार होता है। पत्ते-विपरीत या न्यूनाधिक विपरीत या समूहबद्ध, अत्यन्त सूक्ष्म पारभासक छींटों से युक्त, १-२॥ इञ्च लम्बे, आयताकार या अभिलट्वाकार, चिकने एवं आधार की तरफ छोटे वृन्त से युक्त रहते हैं। फूल-अत्यन्त लाल रंग के होते हैं। फल-गोल और छिलका मोटा होता है। फलों में सफेदीयुक्त लाल अथवा गुलाबी रंग के अगणित नोकदार दाने होते हैं। सूखने पर वह अनारदाना कहलाता है। इसके संपूर्ण फल, जड़ या कांड की छाल, फल की छाल एवं स्वरस आदि का उपयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन-फल के छिलके में पीतरंजक पदार्थ एवं गॅलोटॅनिक अम्ल (Gallotannic acid 28%) रहता है। मूल की छाल में ०.५-०.९% तथा काण्डत्वक् में ०.५% क्षाराभ पाये जाते हैं जिनमें पेलेटीराइन (Pelletierine) मुख्य हैं। इनमें गॅलोटॅनिक अम्ल २२% होता है। गुण और प्रयोग-अनार हृद्य, ग्राही, रोचक, रक्तशोधक एवं शीतल है। (१) इसकी छाल अत्यन्त ग्राही एवं कृमिघ्न होती है। यह विशेष रूप से स्फीत कृमि (Tape worm) में लाभदायक होती है। कृमि के लिए १ छटाक ताजी छाल को २० छटाक जल में उबाल कर, आधा शेष रहने पर, छानकर १, १ छटाक प्रत्येक आधे घंटे पर, ४ बार खाली पेट पिलावें तथा बाद में एरंडतैल दें। अतिसार तथा संग्रहणी में भी छाल का उपयोग किया जाता है। (२) फल का छिलका अत्यन्त ग्राही होने से, अतिसार प्रवाहिका में इसका क्वाथ पिलाते हैं। संपूर्ण फल को जरा भूनकर, कूटकर, रस निकाल उसका भी उपयोग इनमें करते हैं। मात्रा-फल का छिलका, मूलत्वक् १ से २ माशा। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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