भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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७४० भावप्रकाशनिघण्टुः अथ बहुवारः (लिसोड़ा) । तस्य नामानि तत्पक्वापक्वफलस्य च गुणाँश्चाह बहुवारस्तु शीतः सstate/स्यादुद्दालो बहुवारकः । शेलुः श्लेष्मातकश्चापि पिच्छिलो भूतवृक्षकः ।। १०५ ।। बहुवारो विषस्फोटव्रणवीसर्पकुष्ठनुत् । मधुरस्तुवरस्तिक्तः केश्यश्च कफपित्तहृत् ।। १०६ ।। फलमामन्तु विष्टम्भि रूक्षं पित्तकफास्रजित् । तत्पक्वं मधुरं स्निग्धं श्लेष्मलं शीतलं गुरु ।। १०७ ।। लिसोड़ा के संस्कृत नाम-बहुवार, शीत, उद्दाल, बहुवारक, शेलु, श्लेष्मातक, पिच्छिल तथा भूतवृक्षक ये सब हैं। लिसोड़ा-विष, विस्फोट, व्रण, वीसर्प, कुष्ठ, कफ तथा पित्त का नाश करने वाला, केशों के लिये हितकर एवम्-मधुर, कषाय तथा तिक्त रसयुक्त होता है। लिसोड़ा के कच्चे फल-विष्टम्भक, रूक्ष तथा पित्त, कफ और रक्तविकार को दूर करनेवाले हैं। पके फल- मधुर, स्निग्ध, कफजनक, शीतल तथा गुरु होते हैं। [१०५-१०७] ४०. लिसोड़ा हिं०-लिसोड़ा, लिसोरा, छोटा लसोरा। बं०-बहुवार। म०-भोंकर। गु०-गूंदा, गुंदा वड। क०-चल्ले कायि। ते०-चिन्न नक्केरू। ता०-नरिविली। फा०-सपिस्तां, सिपसिस्तां। अ०-सपिस्तां दबक। अं०-(फलनाम) Sebestan (सेबेस्टान्)। ले०-Cordia myxa Roxb. (कॉर्डिया मिक्सा); C. dichotoma Forst. f. (कॉ. डाइ-कोटोमा)। Fam. Boraginaceae (बोरेजिनेसी)। यह प्रायः सब प्रान्तों के वन उपवनों में तथा लगाया हुआ पाया जाता है। इसका वृक्ष-४०-५० फीट तक ऊँचा होता है। डालियाँ-टेढ़ी-मेढ़ी कुबड़ी सी होती हैं। पत्ते-१ से ४-५ इञ्च के घेरे में गोलाकार और शाखाओं पर विषमवर्त्ती लगते हैं। फल-०.५ से १ इञ्च बड़े, पीताभ भूरे एवं पकने पर गुलाबी या कुछ काले होते हैं जिनके भीतर बीच की गुठली के बाहर एक गाढ़ा, मधुर एवं पारदर्शक गूदा होता है। इसे लोग खाते हैं। इसका एक भेद बड़ा लसोड़ा नाम का गुजरात, उत्तरी कनारा एवं दक्खिन में होता है जिसका लेटिन नाम कॉ. वालिशिआई (C. wallichii G. Don.) है। इसके फल कफनिःसारक, ग्राही तथा स्नेहन होते हैं। एक अन्य भेद गोंदी नाम का होता है। इसका लेटिन नाम कॉ. रोथाई (C. rothii Roem & Schult) है। इसका वृक्ष-छोटा; फल-अंडाकार १ से १.३ से० मी० बड़े, लम्बाई में धारीदार, पकने पर पीत या रक्ताभ भूरे एवं खाने लायक होते हैं। यह पंजाब, सिंधु, गुजरात, दक्खिन तथा लंका में होता है। लिसोड़ा के फल, छाल, पत्र एवं बीजमज्जा का उपयोग किया जाता है। रासायनिक संगठन-छाल में टैनिन होता है। गुण और प्रयोग-इसके फल शीत, ग्राही, कृमिघ्न, विषघ्न, मूत्रल, स्नेहन एवं कफनिःसारक है। इनके क्वाथ का उपयोग कफ ढीला करने के लिये, मूत्र की जलन कम करने के लिये तथा अतिसार में करते हैं। छाल का उपयोग जीर्णज्वर एवं कुपचन में करते हैं। इसके बीज की मज्जा का लेप दद्रु में लाभदायक माना जाता है। अथ कतकः (निर्मली) । तस्य नामानि तत्फलगुणाँश्चाह पयःप्रसादी कतकः कतकं तत्फलं च तत्। कतकस्य फलं नेत्र्यं जलनिर्मलताकरम् ।। वातश्लेष्पहरं शीतं मधुरं तुवरं गुरु ।।१०८।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA