भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआम्रादिफलवर्गः ७४१ निर्मली के संस्कृत नाम-पयःप्रसादी और कतक ये हैं। इसके फल को भी 'कतक' ही कहते हैं किन्तु यह नपुंसकलिंग में होता है। निर्मली के फल-मधुर तथा कषाय रस युक्त, नेत्रों के लिये हितकर, जल को निर्मल करने वाले, गुरु एवम्- वात तथा कफ को दूर करने वाले होते हैं। [१०८] ४१. निर्मली हिं० - निर्मली। बं० - निर्मली। म० - निर्मली। गु० - निर्मली, कतकडो। क० - चिल्लिकायि। ता० - तेतन कोट्टई। ते० - कतकमु। ले० - Strychnos potatorum Linn. स्ट्रिक्नोस पोटेटोरम्) । Fam. Loganiaceae (लोगेनिएसी) । इसका वृक्ष-सोन नदी के किनारे, मध्यभारत तथा दक्षिण की ओर पाया जाता है। यह ४० फीट तक ऊँचा होता है। पत्ते-प्रायः २।। इञ्च लम्बे, एक इञ्च चौड़े अंडाकार होते हैं। फूल-सफेद रंग के आते हैं और उनसे सुगन्ध आती है। फल-गोल, पकने पर काले रंग के होते हैं। इसमें गोल कुछ चिपटे बीज होते हैं जो चिमड़े होते हैं। गुण और प्रयोग-निर्मली के बीजों में विष नहीं रहता। इसका उपयोग जल साफ करने के लिये करते हैं। इसके बीजों को काटकर मिट्टी के घड़े के अन्दर रगड़ते हैं, फिर पानी भरते हैं। इससे पानी की गन्दगी नीचे बैठ जाती है। नेत्राभिष्यन्द में बीजों को जल में घिस कर अञ्जन करते हैं। सोजाक, मधुमेह तथा जीर्ण अतिसार में बीजों का उपयोग किया जाता है। जीर्ण अतिसार में आधा बीज मट्ठे में घिसकर पिलाते हैं। अथ द्राक्षा (दाख) । तस्या नामानि तत्पक्वापक्वफलस्य तद्भेदानां च गुणाँश्चाह द्राक्षा स्वादुफला प्रोक्ता तथा मधुरसाऽपि च। मृद्वीका हारहूरा च गोस्तनी चापि कीर्त्तिता ।। १०९ ।। द्राक्षा पक्वा सरा शीता चक्षुष्या बृंहणी गुरुः। स्वादुपाकरसा स्वर्या तुवरा सृष्टमूत्रविट् ।। ११० ।। कोष्ठमारुतकृद् वृष्या कफपुष्टिरुचिप्रदा ।। १११ ।। हन्ति तृष्णाज्वरश्वासवातवातास्रकामलाः। कृच्छ्रास्रपित्तसंमोहदाहशोषमदात्ययान् ।। ११२ ।। आमा स्वल्पगुणा गुर्वी सैवाम्ला रक्तपित्तकृत्। वृष्या स्याद् गोस्तनी द्राक्षा गुर्वी च कफपित्तनुत् ।। ११३ ।। दाख के संस्कृत नाम-द्राक्षा, स्वादुफला, मधुरसा, मृद्वीका, हारहूरा और गोस्तनी ये सब हैं। दाख के पके फल-मधुर तथा कषाय रसयुक्त, विपाक में मधुर रसयुक्त, सारक, शीतल, नेत्रों के लिये हितकर, बृंहण, गुरु, स्वर को उत्तम करने वाले, मूत्र तथा मल की प्रवृत्ति कराने वाले, कोष्ठ में वातकारक, वृष्य, कफ-पुष्टि तथा रुचि के उत्पन्न करने वाले एवम्-तृषा, ज्वर, श्वास, वात, वातरक्त, कामला, मूत्रकृच्छ्र, रक्तपित्त, मोह, दाह, शोष तथा मदात्यय रोग को दूर करने वाले होते हैं। कच्चे दाख के फल-पके की अपेक्षा अल्प गुण वाले एवम् गुरु होते हैं। वे ही यदि खट्टे हों तो रक्तपित्त कारक होते हैं। गोस्तनी-दाख (मुनक्का) - वीर्यवर्धक, गुरु तथा कफ और पित्त का नाशक होती है। गोस्तनी 'मुनक्का' इति लोके ।। १०९-११३ ।।