भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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७४२ भावप्रकाशनिघण्टुः यहाँ पर “मूल में गोस्तनी पद से मुनक्का का बोध लोक में होता है” ऐसा समझना चाहिये । [१०९-११३] ❖ अबीजाऽन्या स्वल्पतरा गोस्तनीसदृशी गुणैः । द्राक्षा पर्वतजा लघ्वी साऽम्ला श्लेष्माम्लपित्तकृत् ।। द्राक्षा पर्वतजा यादृक् तादृशी करमर्दिका ।।११४।। दूसरी जाति की जो थोड़े बीजवाली दाख होती है वह—यद्यपि गुणों में मुनक्का के ही समान होती है तथापि उसमें अपेक्षाकृत स्वल्प गुण होते हैं। पर्वत पर उत्पन्न होने वाली जो दाख है उसे “पर्वतजा” द्राक्षा कहते हैं। वह—पाक में लघु होती है। किन्तु यदि खट्टी हो तो वह—कफ तथा अम्लपित्त को उत्पन्न करने वाली होती है। करमर्दिका के गुण—जिस भाँति “पर्वतजा” दाख के होते हैं वैसे ही इसके भी होते हैं । [११४] ❖ अबीजा = ईषद्बीजा 'किसमिस' इति लोके । पर्वतजा = 'पहाड़ी' इति लोके । करमर्दिका = 'करौंदी' इति लोके ।।११४।। यहाँ पर मूल में “अबीजा” पद से “थोड़े बीज वाली” यह अर्थ समझना चाहिये इसी को लोक में “किसमिस” कहते हैं। “पर्वतजा” को “पहाड़ीदाख” तथा “करमर्दिका” को लोक में “करौंदी” दाख कहते हैं। [११४] ४२. दाख हिं०-दाख, मुनक्का, अंगूर । बं०-मनेका । म०-अंगूर, द्राक्ष । गु०-धराख, दराख । क०-द्राक्षे । ते०- द्राक्षा । ता०-कोट्टन । फा०-अंगूर, मवेझ (सूखा) । अ०-हबुस् सजीव । अं०-Grapes (ग्रेप्स) । ले०-Vitis vinifera Linn. (विटिस् विनिफेरा) । Fam. Vitaceae (विटेसी) । अंगूर, किसमिस, दाख, बड़ी दाख सब एक ही जाति की लताओं के फल हैं। कच्चे, पके, बीजहीन तथा छोटे, बड़े, सूखे आदि फलों के भेद से यह भिन्न-भिन्न नामों से पुकारे जाते हैं। यह लता जाति की वनस्पति फारस, अफगानिस्तान आदि विदेशों के सिवा इस देश में भी कई जगह किन्तु विशेष रूप से उत्तर पश्चिमी भागों में अधिक उत्पन्न होती है। पत्ते—गोलाकार, पाँच दल तथा कटे किनारे वाले और कंगूरेदार होते हैं। फूल—हरे रंग के सुगन्धित होते हैं। फूल तथा फल गुच्छों में आते हैं। अफगानिस्तान और फारस आदि देशों के अंगूर अच्छे होते हैं। काश्मीर में किसमिस, मुनक्का, होंसानी और मस्का नामक कई जातियों के अंगूर उत्पन्न होते हैं। औरङ्गाबाद का अंगूर लाल और स्वादिष्ट होता है। दौलताबाद के अंगूर देश देशान्तरों में भेजे जाते हैं। सब जगह की जलवायु भिन्न होती है इस कारण प्रत्येक स्थान के फलों में कुछ-न-कुछ भेद होता है। रासायनिक संगठन—पक्व फल में शर्करा, कुछ सेन्द्रीय अम्ल द्रव्य जैसे मॅलिक् टार्टरिक्, रेसेमिक् अम्ल तथा आर्सेनिक (१०० सी० सी० रस में ०.०५ मि० ग्रा०) कच्चे फल में आक्ज़ेलिक् अम्ल एवं बीज में स्थिर तैल होता है। इससे आसव, अरिष्ट, सिरका, ब्रॉण्डी आदि बनाई जाती है। इसके फलों का अधिक उपयोग किया जाता है। गुण और प्रयोग—पक्व फल शीतल, संतर्पण, पाचन, स्रंसन, बल्य, कण्ठ्य, रक्तपित्त शामक है। सूखे फल शीतल, स्नेहन, कफ शामक, स्रंसन हैं। अपक्व फल का रस बहुत ग्राही होता है। गर्मी के दिनों में इसको काटने से एक रस बहता है जो त्वग्दोषहर है। रक्तपित्त, पांडु दौर्बल्य आदि में अंगूर से लाभ होता है। ज्वर में इससे दाह एवं तृषा शांत होती है तथा मूत्र भी साफ होता है। मुनक्का का उपयोग खाँसी, पेशाब की जलन तथा शौच साफ होने के लिये करते हैं।