भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 794, कुल 1167 में से

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आम्रादिफलवर्गः ७४३ अथ क्षुद्रखर्जूरी-पिण्डखर्जूरी-छोहारा च। तासां नामानि गुणाँश्चाह भूमिखर्जूरिका स्वाद्वी दुरारोहा मृदुच्छदा। तथा स्कन्धफला काककर्कटी स्वादुमस्तका ॥११५॥ पिण्डखर्जूरिका त्वन्या सा देशे पश्चिमे भवेत्। खर्जूरी गोस्तनाकारा परद्वीपादिहागता ॥११६॥ जायते पश्चिमे देशे सा छोहारेति कीर्त्त्यते। खर्जूरीत्रितयं शीतं मधुरं रसपाकयोः ॥११७॥ स्निग्धं रुचिकरं हृद्यं क्षतक्षयहरं गुरु। तर्पणं रक्तपित्तघ्नं पुष्टिविष्टम्भशुक्रदम् ॥११८॥ कोष्ठमारुतहृद् बल्यं वान्तिवातकफापहम्। ज्वरातिसारक्षुत्तृष्णाकासश्वासनिवारकम् ॥११९॥ मदमूर्च्छामरुत्पित्तमद्योद्भूतगदान्तकृत्। महतीभ्यां गुणैरल्पा स्वल्पखर्जूरिका स्मृता ॥१२०॥ खजूर के संस्कृत नाम—भूमिखर्जूरिका, स्वाद्वी, दुरारोहा, मृदुच्छदा, स्कन्धफला, काककर्कटी तथा स्वादुमस्तका ये सब हैं और दूसरी जाति का जो खजूर है वह पश्चिम (काबुल आदि) देशों में उत्पन्न होता है उसका संस्कृत नाम— पिण्डखर्जूरिका (हिन्दी नाम—पिण्डखजूर है)। एवम्—तीसरी जाति का जो खजूर है जो कि आकार में गौ के स्तन की भाँति होता है तथा दूसरे द्वीप से इस भारतवर्ष में आया है उसको लोग “छुहारा” कहते हैं। और वह भी पश्चिम के देशों में उत्पन्न होता है। उक्त तीनों प्रकार के खजूर—रस में तथा विपाक में मधुर रसयुक्त, शीतल, स्निग्ध, रुचिकर, हृदय को हितकर, गुरु, सन्तर्पणकारक, बलवर्धक एवम्—क्षत, क्षय, रक्तपित्त, कोष्ठस्थित-वायु, वमन, वात, कफ, ज्वर, अतिसार, भूख, प्यास, कास, श्वास, मद, मूर्च्छा, वातपित्त, मद्य से उत्पन्न रोग को दूर करने वाले होते हैं। दोनों बड़े खजूर (पिण्ड- खजूर, छुहारा) से गुण में कम होने से खर्जूर को स्वल्पखर्जूरिका कहते हैं। [११५-१२०] अथ खर्जूरीतरोस्तोयगुणानाह खर्जूरीतरुतोयं तु मदपित्तकरं भवेत्। वातश्लेष्महरं रुच्यं दीपनं बलशुक्रकृत् ॥१२१॥ खजूर के वृक्षों के जल—रुचिकारक, अग्निदीपक, मद, पित्त, बल तथा शुक्र को उत्पन्न करने वाले एवम्— वात तथा कफ के नाशक होते हैं। [१२१] अथ पिण्डखर्जूरीभेदः (सुलेमानी खजूर)। तस्य नामगुणानाह सुलेमानी तु मृदुला दलहीनफला च सा। सुलेमानी श्रमभ्रान्तिदाहमूर्च्छाऽस्र पित्तहृत् ॥१२२॥ सुलेमानी खजूर (यह “पिण्ड खजूर” का भेद है) के संस्कृत नाम—सुलेमानी, खर्जूरी, मृदुला तथा दलहीनफला ये सब हैं। सुलेमानी खजूर—श्रम, भ्रान्ति, दाह, मूर्च्छा तथा रक्तपित्त को दूर करने वाला होता है। [१२२] ४३. खर्जूरी-पिण्ड खर्जूरी (खजूर) हिं०-खजूर, देशी खजूर, खिजूर। बं०-खेजूर गाछ। म०-शिन्दी। क०-इचुली। ते०-इण्टाचेट्टु पेड्डयिटा। गु०-खजूर। फा०-तमर रुतब, खुरमाय हिन्दी। अ०-खुरमातर, रतव हिन्दी। अं०-Date (डेट)। ले०- Phoenix sylvestris Roxb. (फोनिक्स सिल्वेस्ट्रिस)। Fam. Palmae (पामी)। देशी खजूर इस देश के प्रायः सब प्रान्तों में उत्पन्न होता है। इसका वृक्ष—ताड़वृक्ष के समान होता है किन्तु इसकी ऊँचाई कम होती है। पत्ते—६ से ७ फीट लम्बे तथा पक्षाकार होते हैं। पत्रक—६ से १२ इञ्च चौड़े, तीक्ष्णाग्र, विपरीत एवं अग्र में एक पत्रक रहता है। पुष्प—एकलिंगी भिन्न-भिन्न वृक्षों पर आते हैं। कृत्रिम परागण की इसमें आवश्यकता होती है। फल—१ से १ १/२ इञ्च लम्बा, गोलाकार, पीत एवं पकने पर रक्ताभ रहता है। फल के अन्दर बीज रहता है। प्रायः पुष्प एवं फल काल के समय घोर वर्षा हुआ करती है जिसमें फल बनने में बहुत कठिनाई होती है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

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