भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
पृष्ठ 795, कुल 1167 में से
संदर्भ में पढ़ें७४४ भावप्रकाशनिघण्टुः इसके वृक्ष से जो रस निकलता है उसे खजूरी कहते हैं। इससे मद्य बनता है तथा गुड़ भी बनाया जाता है। गुण और प्रयोग-इसके फल बल्य एवं पौष्टिक होते हैं। इसके वृक्ष का रस शीतल मूत्रजनन तथा पौष्टिक पेय माना जाता है। इसकी जड़ दंतशूल में उपयोगी है। इसका मद्य दीपन, पाचन तथा उत्तेजक होता है। यह अन्य विदेशी मद्यों की अपेक्षा अधिक अच्छा होता है। इसकी शर्करा अधिक पौष्टिक तथा सारक है। ४४. छुहारा, ४५. पिण्ड खजूर हिं०-पिंडखजूर, छुहारा, छोहारा। बं०-सोहारा। म०-खारीक। गु०-खारेक। क०-इचुलु, करिइंचुली, करिइंचुलु। ते०-खजूरुपपण्डु। फा०-खुर्मा, खुर्मा खुष्क। अ०-तमर। अं०-Date Palm (डेट पाम)। ले०- Phoenix dactylifera Linn. (फोनिक्स डॅक्टिलिफेरा)। Fam. Palmae (पामी)। छुहारा-ईरान, फारस, काबुल आदि देशों में उत्पन्न होता है और इस देश के पंजाब सिन्ध प्रान्तों में रोपण किया जाता है। इसके क्षुप-ताड़ और नारियल के वृक्षों के समान होते हैं और पत्ते-खजूर के पत्तों के समान पर उनसे कुछ बड़े होते हैं। फल-भी खजूर से बड़ा होता है। जिस प्रकार अंगूर, किसमिस, मुनक्के आदि एक ही जाति के लताओं के फल हैं और कच्चे, पके, बीजहीन, छोटे, बड़े, सूखे आदि फलों के भेद से वे भिन्न-भिन्न नामों से पुकारे जाते हैं उसी प्रकार खजूर छोहारा, पिण्डखजूर आदि एक ही जाति के वृक्षों के फल हैं। इस देश में होने से उसको देशी खजूर कहते हैं और वह गुण में हीन होता है। जिस प्रकार काबुल, फारस आदि देशों के अंगूर, अनार, नासपाती आदि फल इस देश में उत्पन्न हुये फलों की अपेक्षा सुस्वादु और वीर्यबह होते हैं उसी प्रकार काबुल फारस प्रभृति देशों के खजूर सुस्वादु और अधिक गुणवान् होते हैं। अधपके सूखे फल को छुहारा और पके हुये फलों को पिण्ड खजूर या खजूर कहते हैं। इसके सिवा सुलेमानी खजूर, पिण्डखजूर का ही भेद है। रासायनिक संगठन-फलों में विटामिन ए, बी, डी तथा प्रशीताद (Scurvy-स्कर्वी) नाशक विटामिन होते हैं। गुण और प्रयोग-खजूर शीतल, स्नेहन, वृष्य, तर्पण, गुरु, वातपित्तहर एवं कफनिःसारक है। इसका उपयोग क्षय, क्षतक्षय, कास, श्वास, दाह एवं रक्तपित्त में किया जाता है। इसका गोंद अतिसार तथा मूत्रविकारों में लाभदायक है। इसके वृक्ष का रस शीतल तथा सारक होता है। अथ वातादः (बादाम)। तस्य नामानि तन्मज्जगुणाँश्चाह वातादौ वातवैरी स्यान्नेत्रोपमफलस्तथा। वातादः उष्णः सुस्निग्धो वातघ्नः शुक्रकृद् गुरुः ॥१२३॥ वातादमज्जा मधुरो वृष्यः पित्तानिलापहः। स्निग्धोष्णः कफकृन्नेत्र्यो रक्तपित्तविकारिणाम् ॥१२४॥ बादाम के संस्कृत नाम-वाताद, वातवैरी तथा नेत्रोपमफल ये सब हैं। बादाम-उष्ण, स्निग्ध, शुक्रकारक, गुरु एवम्-वातनाशक होता है। बादाम की मींगी-मधुर, वीर्यवर्धक, स्निग्ध, उष्ण, कफकारक एवम्-पित्त तथा वात को दूर करने वाली होती है तथा रक्तपित्त के रोगियों को हितकर नहीं होती है। [१२३-१२४] ४६. बादाम हिं०-बादाम, बदाम। बं०-बादाम। म०-बदाम। गु०-बदाम। ते०-बदाम। ता०-बडुमै। फा०- बदाम। अ०-लोजल। अं०-Almond (ऑल्मण्ड) ले०-Prunus amygdalus Batsch. (प्रूनस् एमिग्डेलस)। Fam. Rosaceae (रोसेसी)। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA