भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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भारत के पंजाब एवं कश्मीर के शीतल प्रान्तों में इसकी उपज की जाती है। यह अफगानिस्तान, ईरान तथा यूरोप में भी होता है। इसका वृक्ष-मध्यमाकार का होता है। टहनियों के अन्त में पत्ते गुच्छों में रहते हैं। पत्ते-भालाकार और बारीक कंगूरेदार होते हैं। फूल-सफेद रंग के आते हैं जिन पर लाल रंग के धब्बे रहते हैं। फल-लम्बाई युक्त गोल होते हैं। बीज-अंडाकार और चिपटे होते हैं। कच्चे फलों का कश्मीर में साग बनाकर खाते हैं। कच्चे फल खट्टे और पके फल खटमीठे होते हैं। बादाम के दो प्रकार पाये जाते हैं। एक की मींगी मधुर तथा दूसरे की कड़वी होती है। बदाम की स्थान भेद से अनेक जातियाँ पाई जाती हैं। मीठा बादाम खाने के योग्य होता है। कड़वा अत्यन्त विषैला होता है। रासायनिक संगठन-कड़वे बादाम में अत्यन्त विषैला तत्व हाइड्रासायेनिक एसिड होता है। करीब ६० कड़वे बदाम में वयस्क मनुष्य के लिये घातक प्रमाण में विष होता है। यह विष उसके उड़नशील तैल में होता है। मीठे बदाम में स्थिर तैल ३५-६२% होता है। यह विष इसमें यदि हो तो बहुत ही कम होता है। गुण और प्रयोग-बदाम मधुर, गुरु, स्निग्ध, उष्ण, बृंहण, बल्य, वातहर, वातनाड़ी बल्य, उत्तेजक एवं कफपित्तकर है। बदाम को रातभर गरम पानी में भिंगोकर दूसरे दिन थोड़ी देर पकाकर उसकी पेया बनाते हैं। यह श्वसन एवं मूत्रजननेन्द्रिय संस्थान के रोगों, मधुमेह तथा स्त्रियों के कटिशूल एवं श्वेत प्रदर में देते हैं। मात्रा-पेया २ से ४ तोला। नोट-देशी बादाम (जंगली बादाम), ले०-टर्मिनेलिया कॅटेप्पा, कॉम्ब्रेटॅसी (Terminalia catappa Linn. Fam. Combretaceae) नामक एक अन्य वृक्ष भी पाया जाता है। इसमें बादाम सदृश बीज पाया जाता है तथा बीज तैल का प्रयोग बादाम के तेल के स्थान पर भी करते हैं। इसकी छाल संग्राही होती है एवं पत्तों का मलहम चर्मरोगों में काम में लाया जाता है। अथ सेवम् । तस्य नामगुणानाह मुष्टिप्रमाणं बदरं सेवं सिवितिकाफलम् १ ॥१२५॥ सेवं समीरपित्तघ्नं बृंहणं कफकृद् गुरु। रसे पाके च मधुरं शिशिरं रुचिशुक्रकृत् ॥ १२६॥ सेव के संस्कृत नाम-मुष्टिप्रमाण, बदर अथवा मुष्टिप्रमाणबदर, सेव तथा सिवितिकाफल ये सब हैं। सेव-रस तथा विपाक में मधुरस युक्त, बृंहण (रस-रक्तादिवर्धक), कफकारक, गुरु, शीतल, रुचि तथा शुक्र को उत्पन्न करने वाला होता है। [१२५-१२६] ४७. सेव हिं०-सेव, सेव। बं०-सेव। म०, गु०-सफरचंद। क०-सेबु। अ०-तूफाह। फा०-सेव, सिव। अं०-Apple Tree (ॲपल् ट्री) । ले०-Pyrus malus Linn. (पाइरस मँलस्) । Fam. Rosaceae (रोज़ेसी) । हिमालय, पंजाब, सिंध, उत्तर पश्चिम सीमांत प्रदेश, मध्यभारत एवं डेक्कन में इसकी उपज की जाती है। उत्तर पश्चिम हिमालय में वन्य भी पाया जाता है। १. सिम्बि(श्वि)तिका इति पा०।